बचपन क्या होता है, मैं क्या जानूँ
मासूमियत, चपलता क्या है, क्या जानूँ
न मैंने महसूस किया वो उन्मुक्त बचपन
जिसे याद कर अक्सर लोग कहते है
बचपन के दिन भी क्या दिन थे
माँ की गोद, लाड-प्यार, कब पाया जो याद करूँ
मैं तो नींद में उठा तैयार किया गया
क्रेच भेजने को, स्कूल में डाला गया,
भरी भरकम बस्तो का बोझ उठाने को
अंको की दौड़ में आगे आने को
बना रहा एक रोबोट उनकी
दबी चाहतो को पूर्ण करने के लिए
मैंने जानी तो सिर्फ टीवी की दुनियां
विडियो गेम्स और कंप्यूटर से पाया ज्ञान l
नाना-नानी,दादा-दादी पहचाने कहानियों से
सानिध्य मिला न किसी का, माँ-बाप के झगड़ो में
ममी-पापा को कभी साथ आते जाते देखा
कभी लड़ते-झगड़ते देखा, कभी किसी और
के संग समय बिताते देखा, कभी घर में
भी अजनवी चेहरे देखे. कभी उम्रड़ता प्यार भी देखा
खूब मिले तो बस चिप्स, कोल्ड ड्रिंक्स, चाकलेट
और मिले बेजुबान खिलोने, पिस्टल और गन्स
रोंब मारने को भी मिले, घर के अस्थायी नौकर
पर मिली नहीं आज़ादी, कभी रूठने की,
बर्तन या दिखावटी सामान तोड़ने की
चंद दोस्त बने और छूटे, उनकी ही मर्जी से
सूनेपन ने बचपन में ही बना दिया रिस्पोंसिबल
उनको गर्व था मेरी उपलब्धियों पर
मैं बन चुका था बचपन में ही अडल्ट
बचपन क्या होता है, मैं क्या जानूँ
यही होता है जो बचपन,
तो नहीं चाहिए ऐसा बचपन
अच्छा होता गर मैं बड़ा ही पैदा होता
विनोद पासी "हंसकमल"
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