Wednesday, 4 July 2012

ऐ चितचोर! मत कर विभोर



न छेड़ ह्रदय की वीणा को
न उलझ समय की धारा से
रहने दे बंदिशे द्वारो में
सुबकने दे, चंद सिसकियो को


जन्मी हूँ इन्ही रीति-रिवाजों में
पली हूँ इन्हीं संस्कारो में
जियी हूँ ख़ुशी-ख़ुशी इन्ही रस्मों में
आनंदित हुई हूँ इन्ही परम्पराओं  में
फिर क्यों बदले जीवन मूल्य मेरे लिए?
फिर क्यों बदले परिभाषाएं मेरे लिए?

शायद आसाँ होता होता तुम लोगो के लिए
भुला के अपनी संगिनी को,
किसी और को संगिनी बना लेना
मैंने जिया है सम्पूर्ण जीवन
और वो यादें ही काफ़ी है शेष के लिए


मन मार, अगर मैं माँ भी लूं
तेरे संग खुद को बांध भी लूं
तेरी देह्ज्वाला को शांत करूँ
पर आत्मग्लानी का बोझ से
खुद को मैं कैसे मुक्त करूँ

इसलिए मैं तुझसे कहती हूँ
ऐ चितचोर मत कर विभोर

विनोद पासी "हंसकमल"

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