इस महानगर में, जब कोई परिचय पूछता है
तो मैं सोच में पड़ जाता हूँ क़ि उसे क्या बताऊँ
कैसे बताऊँ की मैं उसका ही बिछुड़ा साथी हूँ
जो वक़्त की रेलमपेल में ढून्ढ रहा है
अपना ही अस्तित्व
मेरा नाम, उम्र, जात पात, जन्म स्थान, गोत्र
पिता, कॉलेज, स्कूल का नाम तो मेरी
पहचान नहीं हो सकती, कदापि नहीं....
मेरा अकेला होना, शादी-शुदा होना या
किसी के साथ बिन-ब्याहे रहना
जिज्ञासा का विषय तो तो सकता हा
पर मेरी पहचान नहीं, कदापि नहीं....
क्या किसी व्यक्ति-विशेष की संतान होना
या किसी वर्ग विशेष का होना, या
जीवन-यापन करने के लिए कोई
रोजगार चुनना, किसी की पहचान
हो सकती है, मुझे तो नहीं लगता
तो फिर प्रशन वही है, मेरी पहचान क्या है
मेरी एक ऐसी पहचान जो सिमट कर रह गई
सरकारी या गैर सरकारी पहचान पत्र में
जिसमे मेरी एक पूरानी तस्वीर छपी है
कुछ डिटेल्स छपे है, जो मुझको कंठस्त याद है
पर कोई मुझ पर यकीन नहीं करता
उस पर छपे देख सब संतुष्ट हो जाते है
क़ि मेरी पहचान हो गयी
यह बोना सा पहचान पत्र आज
इतना बड़ा हो गया है, के इसके बिना
मैं स्वयं को भी वस्त्रहीन समझता हूँ
कोर्ट-कचेरी, पुलिस थाना, यहाँ तक
की मेरा कार्यालय भी मुझे इसी से पहचानते है
इसे देख सब मुतमईन हो जाते है
की मेरी पहचान हो गयी
फुर्सत .नहीं किसी को जो बेठे पल दो पल
कुछ मेरी सुने, कुछ अपनी कहे,
किसी से गुफ्तुगू तो दिल से
किसी से दिली पहचान तो बने
कोई तो ऐसे मंज़र हो, यहाँ य़े
पहचान पत्र न हो हम इंसानों में
विनोद पासी "हंसकमल"
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