Wednesday, 4 July 2012

छुपा के रखो य़े आंसू, कहीं छलक न जाएँ
अन्दर का इंसान, ज़माने को दिख न जाएँ

किसको फुर्सत है, समझे किसी के दर्द को
हर शख्स लिए घूमता है दर्द के गुबार  को

किस किस से सुनेगा, कोई उसके दिल का हाल
सभी मारे है गम के यहाँ, जी रहे है होकर बेहाल

औपचारिकता बस हम पूछते तो है, सबका हाल
पर सुनना नहीं चाहते किसी के दिल का हाल

डरते है कहीं रिश्ता न जुड़ जाए उसके दर्द से
फिर हम इंसान न बन जाएँ कहीं उसके दर्द से

जब हर तरफ दर्द का अम्बार लग जायेगा
खुशनुमा रहने का एहसास बेमाना  हो जायेगा

छुपा के रखो य़े आंसू, कहीं छलक न जाएँ
अन्दर का इंसान, ज़माने को दिख न जाएँ


विनोद पासी "हंसकमल"

No comments:

Post a Comment