ऐ चाँद ज़रा छुप जा कही
कर ले अठखेलियाँ कुछ बादलो से
हम भी कर ले थोड़ी शरारत चंद्रमुखी से
जैसे तू छिपता है बादलों की ओढ़ में
वो भी छिपती है शर्मो हया की ओढ़ में
कभी तेरी रौशनी में दमकता है उनका नूर
तो कभी तेरे अँधेरे में आता है उन्हें सरूर
मत बंद कर अपनी ये लुका छुपी
इसमें छुप्पी है चाहत की ये अनमोल घडी
उनके चेहरे के भाव पड़ने को है लोचन काफ़ी
फिर भी तेरी य़े लुका छुपी है
हया के परदे गिराने को काफ़ी
विनोद पासी "हंसकमल"
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