Thursday, 5 July 2012

मुझमे है अवगुण बहुत



मुझमे है अवगुण बहुत भरे, भोले शरण तुम्हारी आया हूँ
कुछ मांगने को न हाथ उठे, बिन मांगे ही सब पाया हूँ
ओ कैलाशपति तुम रहते हो, बर्फ से ढके पहाड़ो पर
तुम्हारी रज़ा भी है शामिल, मैं शीश झुकाने आया हूँ
आना इतना आसान नहीं, फिर भी मन में विश्वास जगा
उस बंधी डोर से मैं भक्तो संग, खुद ही खिंचा चला आया हूँ

तुमको कभी समझा ही नहीं, पर ज़ग ही तुम्हारी माया है
इस माया में भी हर तरफ, भोले नाथ तुम्हारा साया है
मनमोहक मानसरोवर में देवात्माए डुबकी लगाती है
उस दिव्य दृश्य को देखने, पल भर समय बिताना है
क्या अर्पण करूँ और कैसे करूँ, सब तुमसे ही तो पाया है
तुम सबमे हो पर सबसे अलग, यह भेद भी तुमसे जाना है
मुझको चुन कर ऐ भोले नाथ, तुमने मुझको अपनाया है

मुझमे है अवगुण बहुत भरे, भोले शरण तुम्हारी आया हूँ
कुछ मांगने को न हाथ उठे, बिन मांगे ही सब पाया हूँ

विनोद पासी "हंसकमल

No comments:

Post a Comment