Thursday, 5 July 2012

यूं भी होता है कभी



यूं भी होता है कभी
अकेली उदास शाम के
धुंधलके में एक चिराग रूपी
चेहरे में ढूँढ़ते है मेरे लब
तेरे लबो को हो कर बेकरार
पलके मुंद जाती है खुद ब खुद
कायनात सिमट जाती है
उस पल.....

और कुछ सूझता नहीं
अचानक उदास शाम
रंगीन हो जाती है
तेरा ख्याल आते ही

विनोद पासी "हंसकमल"

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