यूं भी होता है कभी
अकेली उदास शाम के
धुंधलके में एक चिराग रूपी
चेहरे में ढूँढ़ते है मेरे लब
तेरे लबो को हो कर बेकरार
पलके मुंद जाती है खुद ब खुद
कायनात सिमट जाती है
उस पल.....
और कुछ सूझता नहीं
अचानक उदास शाम
रंगीन हो जाती है
तेरा ख्याल आते ही
विनोद पासी "हंसकमल"
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