Monday, 2 July 2012

रात हमारी नींद जगा कर
तुम तो सो गयी पैर पसार
हमको रात भर नींद न आयी

करवट बदले, लाइट जलाई
लेख पड़े और कविता बांची
होले स्वर में संगीत सुना
बिन आवाज टीवी देखा
बार बार उठे, पानी पिया,
फ्रिज से भी कुछ खाया पिया
बाथरूम भी गए कई बार
पर फिर भी हमको नींद न आयी

ऑफिस जाने की चिंता नें
पल भर भी सोने न दिया
सोना चाहा भी तो बिस्तर ने
नींद को पास फटकने न दिया
और धीरे धीरे रौशनी भी आ गयी

अब सुबह हम उन्नीदा है
चेहरे पर ताजगी भी नहीं
पर ऑफिस तो जाना ही है
दिन तो किसी तरह काटना ही है

रात हमारी नींद जगा कर
तुम तो सो गयी पैर पसार
हमको रात भर नींद न आयी

विनोद पासी "हंसकमल"
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