ग्रीष्म ऋतू में सूर्यदेव
प्रातकाल के प्रवीण प्रज्वलित सूर्यदेव
दीप्तमान रहो सदा इस युग में
सानिध्य तुम्हारा पाने को ज़ग उत्सुक है
कुत्सिक न बनो, ग्रीशन ऋतू में
हम तुम्हे ही तो प्रतिदिन सूर्य नमस्कार करते है
रक्षक बनो, भक्षक बनना शोभा नहीं देता
पाने को प्रतिदिन तुम्हे, हम बलि चंद की चढाते है
सीने से तुम्हे लगाने को पूरा ब्रह्माण्ड तरसता है
फिर क्यों यूं आग बरसाते हो,
फिर क्यों हमें सताते हो
कुछ क्रोध कम करो अपना
हम पर न रही, इस पृथ्वी पर कुछ तो रहम करो
विनोद पासी "हंसकमल"
प्रातकाल के प्रवीण प्रज्वलित सूर्यदेव
दीप्तमान रहो सदा इस युग में
सानिध्य तुम्हारा पाने को ज़ग उत्सुक है
कुत्सिक न बनो, ग्रीशन ऋतू में
हम तुम्हे ही तो प्रतिदिन सूर्य नमस्कार करते है
रक्षक बनो, भक्षक बनना शोभा नहीं देता
पाने को प्रतिदिन तुम्हे, हम बलि चंद की चढाते है
सीने से तुम्हे लगाने को पूरा ब्रह्माण्ड तरसता है
फिर क्यों यूं आग बरसाते हो,
फिर क्यों हमें सताते हो
कुछ क्रोध कम करो अपना
हम पर न रही, इस पृथ्वी पर कुछ तो रहम करो
विनोद पासी "हंसकमल"
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