उम्र ढलते ढलते, परिस्थितियों से
लड़ने की ताक़त भी गुज़र जाती है
देर से ही सही, पर वक़्त के साथ
बदलने की आदत-सी हो जाती है
कोई बात अब अचरज नहीं लगती
कोई बात ज्यादा परेशां नहीं करती
हालात से समझोते हो भी जाए
तो भी बात ज्यादा नहीं अखरती
हम जीते है अपनी हस्ती मिटाकर
जाने से किसी को ठेस नहीं लगती
अपनी बसाई गृहस्ती में
कब बेगाने हो जाए क्या पता
विनोद पासी "हंसकमल"
लड़ने की ताक़त भी गुज़र जाती है
देर से ही सही, पर वक़्त के साथ
बदलने की आदत-सी हो जाती है
कोई बात अब अचरज नहीं लगती
कोई बात ज्यादा परेशां नहीं करती
हालात से समझोते हो भी जाए
तो भी बात ज्यादा नहीं अखरती
हम जीते है अपनी हस्ती मिटाकर
जाने से किसी को ठेस नहीं लगती
अपनी बसाई गृहस्ती में
कब बेगाने हो जाए क्या पता
विनोद पासी "हंसकमल"
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