खुशियों की रिमझिम में हूँ नहाई
पर बदन से खुशबू तेरी ही आयी
बढकर छू लिया ऐसे मेरे अंतर्मन को तुने
क़ि ढकी लिबास में भी हो गयी निर्वस्त्र जैसे
खो गयी सारी शर्मो ह्या न जाने कहाँ
पल पल, हर पल, साथ डोलते रहते तो
खुली पलकों में सपने पिरोते रहते हो
मुझसे ही बतियाते रहते हो हरदम
मन पुलकित हो उठता है
जब तुमसे बातें करता है
सब कष्ट बोने से लगते है
जब तुम सपनो में होतो हो
जीने को मन भी करता है
जब तुम मेरे संग होते हो
मैं चाहती हूँ, तुम सामने रहो
बस देखूं तुम्हे हर पल,
छूकर देखूं, च्यूंटी काटूं
महसूस करूँ तुम्हारा वजूद
कहीं मैं निद्रा में तो नहीं खोई
विनोद पासी "हंसकमल"
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