मैं अक्सर छत पर जाकर
परिंदों को दाना पानी डालता हूँ
मेरे पड़ोसियों को शिकायत है
क़ि यह परिंदे गन्दगी फैलाते है
उनके कीमती घर गंदे कर जाते है
उन्हें अपने आस पास पड़े कूड़े के
अम्बारों से गंध नहीं आती
न ही शर्म आती है, इधर उधर
पानी, बीडी, गुटके खाकर थूकने से
बुरा लगता है सिर्फ परिंदों का आना
मैं न भी खिलाऊँ तो भी वो आएंगे
शायद वो चाहते है की आकाश वीरान हो जाए
पर मैं सृष्टि की हर रचना, हर कृति हो
उसके जीवंत रूप में देख उनसे बतियाना चाहता हूँ
परिंदे भी बहुत समझदार हो गए है
वो भी मेरे कृत्य को पहचानते है,
उन्हें आदमजात पे अविश्वास है
दाना डालते देख भी नहीं आते
मेरे जाने का इंतज़ार करते है
विनोद पासी "हंसकमल"
No comments:
Post a Comment