जिंदगी-
पानी का बुलबुला-
जी रहा हूँ
काटों के बिस्तर पर
अरमानो के पुल पर
सपनो के महल को होते
देख धराशाही
झुक रहा हूँ-
वास्तविकता की और
मैं अनचाहे ही बदल रहा है
स्वयं को, न चाहते हुए भी
हो रहा हूँ दूर अपने से
चल पड़ा हूँ एक ऐसे डगर
जिसकी मंजिल भी है अस्पष्ट
विनोद पासी "हंसकमल"
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