Tuesday, 3 July 2012

काश ! क़ि तुम यहाँ होते

 
काश ! क़ि तुम यहाँ होते
जीवन के दुखद षण भी सुखद होते
काश ! क़ि तुम यहाँ होते

बिखरी लटों को संवारने के लिए
खुश्क होटों पे स्वर्णिम लालिमा लाने के लिए
उखड़ी श्वासों को नव जीवन देने के लिए
काश ! क़ि तुम यहाँ होते

सावन के गरजते नगाड़ों में
ह्रदय क़ि उठती तरंगों में
समीर के चंचल झरोकों में
नदिया की कलकल धारों में
काश ! की तुम यहाँ होते

कोयल की पीयु पीयु
ह्रदय का भेदन करती है
की नन्ही बूंदे भी
अब वार शूल सा करती है

देख मयूर का नृत्य 
उछ्वासे कम्पन करती है
पूस-माघ के लम्बी राते
बेचैन मुझे अब करती हैं

समझ वेदना तुम मेरी 
शीघ्र यहाँ पर आ जायो
जीवन के दुखद षण भी सुखद हो जाए
जो काश तुम यहाँ आ जायो 

विनोद पासी "हंसकमल"

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