Tuesday, 3 July 2012

वह ( एक आम आदमी)



आशा निराशा संग लिए
हांफते कदमो के दौड़ रहा है
कई रहो, कई मंजिलो पर
चींटी की चाल से
समय की पाबंदियों में
शकेस्पियर, शाह, रस्सेल , होमर,
चर्चिल. लिंकन. केनेडी,
नेहरु, सुभाष, गाँधी, पटेल,
टैगोर, अरविन्द, वाल्टर
सीज़र, नपोलियन, हिटलर,मुसोलिनी
पाब्लो पिकासो, मेकालेंजो
लिओनार्ड डा विन्ची
सब कुछ पढ़ चुका है

ऐसा ही कुछ बनने की चाह में
इतिहास के पन्नो में
लोगों की जुबान पर
समां जाने की चाह में
जी रहा है वह
एक गृहस्थी


अपने छोटे से 'वृत'  में
समझदार, पर 'य़े लोग'
पागल और संकी भी कहते है
उसे-----
शायद वह एक मामूली आदमी है
क्योंकि आदमीं अपनी पोस्ट से
आँका  जाता है न की ज्ञान से

सड़के दौड़ रही है,
मशीने कुचल रही है
वैश्वीकरण और उदारवादी
नीतियों के चंगुल में फंसा
बड़े राष्ट्र निगल रहे है
अविकसित देशो को

इतना वृहद संसार
दबा गया उसके बोने व्यक्तित्व को
वह गुलाम बना रहा परिस्थतियों का
तोड़ न पाया अपनी ज़ंजीरो को

कुछ दिन में 'य़े लोग'
उसे भूल जायेंगे
अस्थियाँ जला देंगे उसकी
इतिहास उसे  नहीं समायगा
अपने विस्तृत गर्भ में
उसका अंशदान कुछ भी तो नहीं रहा
उसने अपने छोटे से जीवन-वृत में
अपना रास्ता नहीं बनाया

विनोद पासी "हंसकमल'

  

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