Monday, 2 July 2012

खुद ना आये लौट के
यादों  पे भी कब्ज़ा डाला

चार दिनों की दोस्ती नें
हमको य़े किस  मुश्किल में डाला
जीवन की इस कठिन डगर पर
साथ तुम्हारा मिला हमको क्योंकर
न फिर चल पाए हम ही अकेले
न ही हुआ किसी का  साथ गंवारा

तुमने तो मुस्कराकर कह तो दिया
अब हमको तुम भूल ही जाना
तुम्हे भूलना इतना आसाँ जो होता
तो शायद हमें इतना गुम भी न होता

विनोद पासी "हंसकमल"

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