खुद ना आये लौट के
यादों पे भी कब्ज़ा डाला
चार दिनों की दोस्ती नें
हमको य़े किस मुश्किल में डाला
जीवन की इस कठिन डगर पर
साथ तुम्हारा मिला हमको क्योंकर
न फिर चल पाए हम ही अकेले
न ही हुआ किसी का साथ गंवारा
तुमने तो मुस्कराकर कह तो दिया
अब हमको तुम भूल ही जाना
तुम्हे भूलना इतना आसाँ जो होता
तो शायद हमें इतना गुम भी न होता
विनोद पासी "हंसकमल"
यादों पे भी कब्ज़ा डाला
चार दिनों की दोस्ती नें
हमको य़े किस मुश्किल में डाला
जीवन की इस कठिन डगर पर
साथ तुम्हारा मिला हमको क्योंकर
न फिर चल पाए हम ही अकेले
न ही हुआ किसी का साथ गंवारा
तुमने तो मुस्कराकर कह तो दिया
अब हमको तुम भूल ही जाना
तुम्हे भूलना इतना आसाँ जो होता
तो शायद हमें इतना गुम भी न होता
विनोद पासी "हंसकमल"
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