Monday, 2 July 2012

बादलों का झुण्ड


कहाँ जा रहा है
यह बादलों का झुण्ड
धरती तो यहाँ की प्यासी है
क्या इन्हें धरती का गुरुत्वाकर्षण
भी बरसाने में असमर्थ है?

इन दिनों आस रहती है हर उस बूँद की
जो मिटा सके धरती की प्यास
पर जल-कण खेलते है आँख मिचोली
दिखला  के सपने हज़ार, बदल घूमते
रहते है आवारा, कभी गरजते है
तो कभी यूं ही चक्कर लगा चले जाते है
मानों कोई रस्सा-कशी का खेल चल रहा हो
कुछ प्यासे धरती के टुकडो में

विनोद पासी "हंसकमल"

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