Monday, 2 July 2012

तुम्हारे जाने के बाद


आज, जब तुम  नहीं हो,
घर में कितनी शांति है
ऐसा  नहीं क़ि तुम्हारे होने से
कोई खास शोर-शराबा होता है
पर य़े एहसास तो होता है
क़ि तुम घर में हो, यहीं कहीं
पास नहीं तो दूर ही होगी,
किचन में होगी या लेटी होगी
बिस्तर पर पीठ सीधी करने को

आज एहसास है क़ि मैं अकेला हूँ
अपनी स्वतंत्र मर्जी का मालिक हूँ
टीवी, विडियो  के कंट्रोल्स सामने  पड़े है
पर आज उन्हें उठाने का मन नहीं
आज कोई शोरगुल पसंद नहीं

तुम्हारे जाने के बाद
मैं चैरिटी बाज़ार गाया
कुछ छोटी मोटी खरीदारी की
पर आज भीड़ भाड़ रास न आयी
जल्द लौट आया घर में
कुछ पुस्तकों के पन्ने पल्टे
कुछ कविता पाठ किया,
काफ़ी पी, और मुद्दतो बाद
कुछ लिखने का मन बनाया

इस वक़्त जहाज़ तुम्हें उडा रहा है
पर  तुम खुद भी तो  उड़ रही हो
मग्न हो बेटे के  खयालो में
तुम्हे पाकर वो भी बहुत खुश होगा,
इंतज़ार कर रहा होगा
मेनचेस्टर एअरपोर्ट पर, रात  दोने
बातें करोगे बहुत देर तक 

मैं भी आज अपने आपसे करूंगा हजारों बातें
अपने से रूबरू होऊंगा , खुद को खुद में
तलाश करूंगा, मन ही मन अपनी आज़ादी का
इस्तकबाल करूंगा, तुमसे दूर रहकर भी
तुम्हे चाहूँगा, तुमसे प्यार करूंगा
तुम ही तो हो मेरे वजूद  की सम्पूर्ण ताक़त


देखूँगा, यह दूरियां मुझे मेरे  कितना करीब लाती है
मुझमे कितनी संवेदनाये जगाती है, क्योंकि आज
मुझे कोई जल्दी नहीं,  कोई जवाबदेही नहीं
आज सिर्फ मैं हूँ, अपने पास और कोई दूसरा नहीं
कोई बंधन नहीं, किसी से कोई उपेक्षा नहीं
सिर्फ मैं और मेरी तन्हाई में सिमटा है य़े माहौल

बाहर पिंजरे में , तुम्हारी प्रिय चिड़ियाँ सो चुकी है
मस्जिद की आखिरी अज़ान भी बहुत पहले खामोश
हो चुकी है, कल सुबह फिर से बजने को,
आवाज आ रही है तो सिर्फ घडी की टिक टिक टिक की
या फिर अपने  इतालियन पडोसी के पिआनो की
कहने को मैं आज अकेला हूँ
पर आज हाथों में मेरा पेन है
सामने सफ़ेद कागजो का ढेर है
और मेरी कलम उनसे बातों में मशगूल है
इस अदृष वार्तालाप में कोई श्रोता नहीं
कोई प्राणी नहीं, न जुबां की ज़रुरत
न कणों की, बस एक डोर  से बंधे
शब्द उतरते आ रहे है आस्मां से
और बिखरते जा रहे है
इन सफ़ेद पन्नो पर मोतियों की तरह

आज इन्हें समेटने के कोई इच्छा नहीं
क्योंकि इन्ही शब्दों की तो तलाश थी
तुम्हे बरसो से, मैं भी भटक गया था
इनकी चाह में, आज मिले है
एक बहुत लम्बे अंतराल के बाद
तुम्हारे जाने के बाद
कहीं फिर न खो जाए
तुम्हारे  आने के बाद

संवेदनाये भी दफ़न हो जाती है, साथ रहते रहते
जब शुरू होता है, चक्र ज़िन्दगी काटने का
कितना बेबस हो जाता है इंसान, साथ रहकर
अकेला हो जाता है, और विडंबना देखो, अकेला
होते ही अपने साथ हो लेता है, अरमान जाग जाते है
और खुद से प्यार हो जाता है, हम खुद से वो सब
बातें करते है, जो कभी  दूसरे को संकोच वश कह नहीं पाते,
साथ रहना अच्छा है, अच्छा ही नहीं बहुत अच्छा है
पर कभी कभी य़े दूरी भी ज़रूरी है
यहीं से तो जन्म लेती है वो भावनाएं
जो वक़्त के साथ साथ दफ़न हो जाती है
और हम य़े जान ही नहीं पाते
क़ि आखिर य़े सूनापन क्यों है ?

जिंदगी में स्पेस घर के अकार को नहीं कहते
यहाँ स्पेस होता है, एक दूसरे को चट्टान का
सहारा देना, उसे चाहना, उसे प्यार करना
और अपनी एक राह चुनना.
कभी कभी मिलने के लिए
बिछुड़ना भी ज़रूरी है

आज की जुदाई सुखद है, तुमसे दूर,
मगर अपने पास हूँ मैं,
सुबह का तुम्हारा स्पर्श भूला नहीं हूँ
महसूस कर रहा हूँ अब भी
अपने अतीत को जागते हुए देख रहा हूँ
कुछ लिख रहा हूँ, कुछ पढ़ रहा हूँ
कुछ गीत गुनगुना रहा हूँ
तुम्हारे जाने के बाद


विनोद पासी "हंसकमल"

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