पार्क में संग तुम्हारे विचरण करते
ख़ामोशी की चादर इस कद्र
फैल चुकी थी क़ि कदमो को
अपना बोझ भी भरी लगने लगा
गिरगिट ने भी अपना एहसास कराया,
टूटती दिवार के कोने से निकल
कुकुरमते ने भी परिचय दिया
हम दोनों चल रहे थे साथ साथ
अपने आप में गुमसुम
और दूरियां इस कद्र बढ़ चुकी थी
की शायद हम दोनों एक-दूसरे से
बिछुड़ने का इंतज़ार कर रहे थे
विनोद पासी "हंसकमल"
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