कौन कहता है जल हमेशा शीतल है
मेघों से आग निकलती देखी है
आनंद पाया है कडकती धूप में
महसूस की है घुटन बंगलो में
पाई है सुख-चैन की नींद
पार्क में लगी बेंचो पर
जो खुशियाँ है गरीबी में
कहाँ है वो सुख वैभव में
हमने तो हमेशा टूटकर गिरते फूलों को
मुस्कराते देखा है काँटों में
विनोद पासी "हंसकमल"
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