Tuesday, 3 July 2012

एकाकी सफ़र




वक़्त के ज़हाज पर
हमने संभाला था 
एक दूजे को 
और संग  उड़े थे 
काफ़ी ऊँची उडान


पार्टियों की घुटन में
मेरी स्वांस फूलने लगी थी
तुम मजबूर-सी रह गयी थी
उस वातावरण में जीने को 
तुम्हे खुद वो सब भाने लगा था


याद होगा तुम्हे, कितनी गहरे में
डूबा था, संग तुम्हारे मैं भी, 
तुम्हे मिल गया सहारा पण-डुबी का
पर मुझ तक कोई पण-डुबी 
पहुँच न पाई, और वही से शुरू हुआ
मेरा य़े एकाकी सफ़र 

विनोद पासी "हंसकमल" 


No comments:

Post a Comment