वक़्त के ज़हाज पर
हमने संभाला था
एक दूजे को
और संग उड़े थे
काफ़ी ऊँची उडान
पार्टियों की घुटन में
मेरी स्वांस फूलने लगी थी
तुम मजबूर-सी रह गयी थी
उस वातावरण में जीने को
तुम्हे खुद वो सब भाने लगा था
याद होगा तुम्हे, कितनी गहरे में
डूबा था, संग तुम्हारे मैं भी,
तुम्हे मिल गया सहारा पण-डुबी का
पर मुझ तक कोई पण-डुबी
पहुँच न पाई, और वही से शुरू हुआ
मेरा य़े एकाकी सफ़र
विनोद पासी "हंसकमल"
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