जगह दिखाई नहीं देती कहीं भी समतल
गहरे कूपों और खंदको से घिर-सा गया हूँ
गीली रेत पर जो आकृति बनाता हूँ
अगले ही पल लहरें मिटा जाती है
पक्षी उडाता हूँ तो बाज का डर सताता है
गाड़ी चलता हूँ तो एक्सिडेंट का डर सताता है
एक मर्यादा तोड़ता हूँ, तो सौ में घिरा पता हूँ
हर पल डर के जीते हुई भी ख़ुशी मनाता हूँ
मैं कौन हूँ, किस मकसद से यहाँ आया हूँ
हर वक़्त इसी तलाश में खुद को भटकते पाता हूँ
विनोद पासी "हंसकमल"
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