घास में पड़े
अधजले सिगरेट के टुकड़े से
निकलती धुएं की लकीर.......
टेडी- मेढ़ी उठती सी
बुझी एश-सी जलती गिरती
कट रही है ज़िन्दगी
उठते धुएं में से
धुंधला-सा तुम्हारा चेहरा
मुस्कराता है....
पर य़े क्या
तुम तो
मदभरे प्यालो से जाम
छलका रही हो अनजान होटों पर
ह्रदय- रूपी इंजन में
जलते शोले भभकने लगते है
और मेरा अस्तित्व छुपने लगता है
धुँए की उस टेढ़ी मेढ़ी लकीर में
विनोद पासी "हंसकमल"
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