Tuesday, 3 July 2012

धुँए की लकीर




घास में पड़े
अधजले सिगरेट के टुकड़े से 
निकलती धुएं की लकीर.......
टेडी- मेढ़ी  उठती  सी 
बुझी एश-सी जलती गिरती 
कट रही है ज़िन्दगी 


उठते धुएं में से
धुंधला-सा तुम्हारा चेहरा 
मुस्कराता है....
पर य़े क्या
तुम तो
मदभरे प्यालो से जाम
छलका रही हो अनजान होटों पर


ह्रदय- रूपी इंजन में
जलते शोले भभकने लगते है
और मेरा अस्तित्व छुपने लगता है
धुँए की उस टेढ़ी मेढ़ी  लकीर में


विनोद पासी "हंसकमल" 

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