Sunday, 12 August 2012

मेरी कविता




मैं जीता हूँ अपनी कविता संग, और सोता भी हूँ कविता संग
यह हर पल मुझमे बहती है, मुझे कुछ कहती रहती है

मैं जब भी अकेला होता हूँ, यह चुपके से संग हो लेती है
और आते ही पास किसी के झट से कहीं खो जाती है

यह मुझसे बतियाती रहती है, कुछ याद दिलाती रहती है
मैं जब इसमें खो जाता हूँ, यह राह मुझे दिखलाती है

पूरी कविता तो तो कभी नहीं, कुछ अंश ही लिख पाता हूँ
लिखता हूँ अपने विचारो को, जहन में आये उन खयालो को
पर उस रूप में उतर नहीं पाती, जिस रूप में मन में आती है

मैं लिखना चाहता हूँ कुछ और, यह कुछ और ही बन जाती है
पर जो भी बनती है, अच्छी लगती है, मन को भाती है
स्वयं अपने को व्यक्त करने में शक्षम बन जाती है

मेरी कविता एक नदी है जो कहीं  गहरी, तो कहीं  फैलाब लिए
कहीं सिर्फ कीचड है तो कहीं स्वच्छ जल- धार है.
उसे मात्रायों और छंदों  में बाँध,  एक  नहर मत बनायो
वो बहेगी और जाएगी उन राहो पर जहाँ उसका मन होगा
कविता की राह बनाई नहीं जाती, वो खुद अपनी  राह चुनती  है

मेरी कविता में हँसीं मजाक नहीं, लोगो को हंसा हंसा कर लोट पोट करे
मनोरंजन की भी इसको कला नहीं, ये आइना है समाज का,
अपने आसपास का ,जो रचना सोचने को को मजबूर करे
अपने इर्द गिर्द , अपने अन्दर झाँकने के मजबूर करे
वही समझो मेरी कविता है, बस वही मेरी कविता है
विनोद पासी "हंसकमल"

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