राख तो होना ही था, चाहे ज्वाला बन के जलती
या सुलग सुलग के जलती अगरबत्ती की तरह
अपने अन्दर की आग को बुझाने के लिए
अक्षुयों का जल भी अक्सर कम पड़ जाता है
नयनों के नीर बहकर खुश्क हो गए
पर नहीं बुझी सिसकियों की आवाज
शायद अभी कुछ टीस है सीने में
मैं भीतर ही भीतर सुलग रही हूँ
अब भी अगरबती की तरह
विनोद पासी "हंसकमल"
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