Wednesday, 8 August 2012

भिखारी कौन ?



मंदिरो, मस्जिदों और गुरुद्वारों  में,
मन्नतो और मुरादो में जिंदगी गुज़र गयी
पर न ख़तम हुई कभी  ख्वाइशो की लड़ी,
बढती ही गयी,  ख्वाइशे  पूरी   होकर भी
पर न ख़त्म हुआ, कभी  सिलसिला  मांगने का

मांगने से  कभी कुछ मिला है किसी को
सब मिलता है अपने कर्मो का फल
बस हम  श्रेय दे देते है उस अदृष शक्ति को
जिससे मांगी थी ढेरो मन्नते हमने 

कभी न  सोचा  शुक्रिया करें उस परवर्दिगार का
जिसने हमें सब कुछ दिया बिन मांगे ही.
बस भिखारियों  की  तरह हाथ जोड़, सर झुका
पहुंच जाते है   उसके हर  देव-स्थल पर,


मांगते रहे कुछ न कुछ मुरादे और मन्नते
और नफरत करते  रहे वहीँ  खड़े भिखारियों  से
क्यां फर्क है  दोनों में , वो पेट के लिए मांगते है
हम मांगते है लालच,  वो मांगते है बाहर
हम मांगते है अन्दर जाकर


विनोद पासी"हंसकमल

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