Thursday, 20 September 2012

मेरी लघु कहानी (१)

तीन मजदूर से दिखने वाले लोग पथरों , को काट पीट कर  तोड़  रहे थे.  पास से निकलते एक सम्वाददाता नें तीनो से अलग अलग बुलाकर पूछा की वो क्या कर रहे है. 

पहले ने जवाब दिया, " जी मैं तो ध्याड़ी पर मजदूरी कर रहा हूँ, शाम को पैसे मिलेंगे, तो घर चला जायूंगा"

दूरसे मजदूर ने जवाब दिया" यहाँ राष्ट्रीय राज्यमार्ग बन रहा है, मैं उसके लिए पत्थर तोड़ रहा हूँ. इसकी मुझे मजदूरी तो मिलेगी ही, साथ ही साथ यह गर्व भी  हो रहा है, की मैं अपनी संतान को कुछ वर्षो बाद यह बताऊँगा की इस सड़क के निर्माण में मेरा भी योगदान रहा है"

तीसरे व्यक्ति ने बहुत शालीनता से जवाब दिया" मैं कोई पत्थर नहीं तोड़ रहा.  मैं एक  मूर्तिकार हूँ, इस पत्थर में  एक सुन्दर सी मूर्ति ढून्ढ  रहा हूँ"

सम्वाददाता ने कहा, "मुझे  तो इसमें कोई मूर्ति नहीं दिख रही? तुम मूर्ति तराश रहे हो या ढून्ढ रहे हो, मैं कुछ समझा नहीं"

वह बोला," मूर्ति तो इस बड़े से  पत्थर में पहले से ही बनी है, मैं तो बस उसके आस-पास की मिटटी और कंकर हटा कर उसके सौंदर्य को  दुनिया के सामने पेश करने की कोशिश कर रहा हूँ"

विनोद पासी "हंसकमल"

No comments:

Post a Comment