Thursday, 20 September 2012

मेरी लघु कहानी (2)

एक सेठ के यहाँ मकान की छत डल रही   थी  कुछ मजदूर उस दिन कम आये थे.  अभी सुबह के साडे सात ही बजे थे.  उसे मजदूरों की ज़रुरत महसूस हुई. वह मजदूरों   के बाज़ार में गया और उसने मजदूरों  को पूरे दिन काम करने के लिए पूछा.  सभी तैयार थे. उसने उनसे एक दिन के कार्य का रेट पुछा.  किसी नें  २५० तो किसी ने ३०० रुपये बताये.  उसने चार  तंदरुस्त से  मज़दूर चुने  और उनसे  पुछा भाई कितना लोगो, पूरे दिन का.  मज़दूर बोले , " साहिब ३०० रूपये से एक पैसा भी कम नहीं".  सेठ नें उन्हें पूरे दिन के लिए काम पर रख लिया

          दोपहर होने तक लगा की आज काम पूरा नहीं होगा अगर कुछ और मजदूर न बुलाये गए. १२ बज चुके थे, ठेकेदार ने दो मजदूरों का इन्तेजाम करने तो सेठ को कहा.  सेठ दो मजदूरों की तलाश में फिर बाज़ार पहुँच गया.  अब वह कोई मज़दूर नहीं था.  सेठ जी के कहने पर कुछ लोगो ने दो और मजदूरों को कहीं से ढून्ढ निकला.  सेठ नें पूछा, "भाई शाम तक का काम है, कितना लोगो". उन्होंने आपस में कुछ विचार किया और बोले, " साहेब ३०० रूपये ही लेंगे ".  सेठ की majboori थी सो मान गया और उन्हें दोपहर १ बजे से काम पर लगा दिया.


       शाम होते होते, दो और मजदूरों की ज़रुरत महसूस हुई.  ठेकेदार ने मज़दूर लाने में अपनी असमर्थता जाता दी और सेठ को फिर वही जाना पड़ा.  शाम के साडे-चार बज रहे थे.  अब तो वहां कोई भी मजदूर मिलना असंभव था.  काफी मुशाकत के बाद कही से उसने दो लोग ढून्ढ ही लिए.
वो भी सेठ की मजबूरी समझ रहे थे, उन्होंने भी ३०० रूपये ही मांगे.  सेठ के पास कोई चारा न था. उसने उनको भी काम पर रख लिया

         जब काम ख़त्म हुआ तो इन सब मजदूरों नें एक दुसरे से पूछा की सेठ ने उन्हें कितने रूपये दिए.  सुबह आने वाला ग्रुप , सेठ से नाराज था, की उन्होंने पूरे दिन कार्य किया जबकि दूरे ग्रुप नें सिर्फ आधे दिन काम किया, इसलिए उन्हें दुसरे ग्रुप से ज्यादा मिलना चाहिए . दूसरा ग्रुप नाराज था की तीसरे ग्रुप वालो ने तो सिर्फ दो घंटे ही काम किया तो उन्हें ३०० क्यों मिले?  पहले ग्रुप वाले बोले, " यह  तो ज्यादती है, जिन्होंने २ घंटे काम किया उन्हें भी अपने ३०० रूपये दिए, और हमें  भी ३०० रूपए. हम तो सुबह से काम कर रहे है .  इस हिसाब से तो हमें १२०० रूपये के हिसाब से मिलना चाहिए"  दूसरा ग्रुप बोला, " इस हिसाब से तो हमें भी ६०० रूपये मिलने चाहिए"

          सेठ ने सबसे कहा की" जो तुमने कहा मैंने तुम्हे वही दिया, अब इसमें मुझ पर ज्यादती का इल्जाम कहाँ से आ गया.  मैंने किसी से ज्यादा काम नहीं कराया और न ही किसी से ओवर टाइम करवाया.  फिर मैं तुम्हे ज्यादा क्यों दूं."

         सही है की लोग अपने नसीब से नहीं बल्कि दूसरो के नसीब से ज्यादा जलते है

विनोद पासी 'हंसकमल"

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