क्या बचपन से कोनवेंट स्कूल एवं घरों में हिंदी का उपयोग ना होना भी हिंदी को पतन की और ले जा सकता है ?
हिंदी भाषा की अवनति के कारण ढूँढने लगे, तो बहुत से कारण मिलेंगे. उनमे
से एक प्रमुख कारण यह भी है क़ि जब किसी बच्चे का मात्र-भाषा से सम्बन्ध
शिशुकाल से ही तोड़ दिया जाता है तो वह कभी उसकी मात्र-भाषा बनती ही
नहीं. किसी भी शिशु से जिस भाषा में उसकी माँ उससे बातचीत करती है वही
उसकी मात्र-भाषा बन कहलाती है. जब शिशु पालने में होता है तो वो उन शब्दों
के समझने का प्रयत्न करता है, जो उसके आस पास के लोग प्रयोग करते है. अब
अगर किसी शिशु के साथ उसके माता-पिता या घर के अन्य सदस्य बातचीत करेंगे तो
वही स्वाभाविक रूप से उसकी मात्र-भाषा बन जायेगी. जैसे जैसे बच्चा बड़ा
होता है, वो अपने आस-पास की आवाजों को और व्यक्तियों को पहचानने लगता है.
अगर उस घर के सदस्य आपस में हिंदी में बातचीत करते होंगे तो उसकी
मात्र-भाषा हिंदी बन जाएगी, अगर तमिल या तेलगू में बातचीत करते होंगे तो
तमिल या तेलगु उसकी मात्र-भाषा बन जाएगी और अगर वो लोग इंग्लिश या किसी और
भाषा में बातचीत करते है, तो वही उस बच्चे की मात्र-भाषा बन जाती है.
बच्चो को तो छोडो, आजकल तो लोग अपने कुत्तों और बिल्लियों से भी इंग्लिश
में बातचीत करते है. और मज़े की बात तो यह है क़ि यह जानवर भी इंग्लिश समझ
जाते है, बस पढ़ लिख और बोल नहीं पाते क्योंकि उनके पास वो शमता (कृपया इस
शब्द को ठीक कर ले, क्योंकि में भी हिंदी इंग्लिश फॉण्ट से ही टाइप कर रहा
हूँ) ही नहीं है.
प्रशन यह उठता है, क़ि हम लोग क्यों अपने बच्चों से इंग्लिश में बातचीत करते है? उसका सीधा कारण है क़ि जिस भाषा में हम लोग अपने आप को सहज महसूस करते है, हम वही भाषा अपनी रोज मर्रा की ज़िन्दगी में भी प्रयोग करते है. अगर किसी बच्चे के माँ बाप कॉन्वेंट स्कूलों में पढ़े है तो निसंदेह उनके लिए इंग्लिश में बातचीत करना उतना ही सहज होगा जितना हिंदी स्कूलों में पढ़े लिखे लोगों के लिए हिंदी में बातचीत करना. इसका दूसरा प्रमुख कारण है क़ि हमारे देश में, बदकिस्मती से, इंग्लिश में बातचीत करने बालों को बहुत आदर से देखा जाता है. इसका एक साधारण सा उद्धारण है, किसी भी हिंदी भाषा के स्कूल में इंग्लिश भाषा के अध्यापक का सम्मान. होना तो बिलकुल इसका उल्टा चाहिए. ज़रा सोच कर देखो क्या किसी हिंदी भाषा के स्कूल में, हम फ्रेंच, स्पेनिश, मन्दारिन, रुसी या जर्मन भाषा के अध्यापक का उतना ही सम्मान करते है जितना इंग्लिश भाषा को पढ़ने वाले का? नहीं, बिलकुल नहीं. क्योंकि उन भाषायों को भारत में उतना आदर नहीं मिलता जितना की इंग्लिश को मिलता है.
जब हम अपने बच्चो के कॉन्वेंट स्कूलों में भेजते है, तो हम कहीं न कहीं उनके सुप्त मन में यह विचार पैदा कर देते है क़ि हम स्वयं अपनी मात्र-भाषा से या हिंदी से उतना प्यार नहीं करते,उसका इतना सम्मान नहीं करते, जितना हमें करना चाहिए. और यह बात बच्चा घर में हमारे व्यव्हार को देख समझ चुका होता है. हम अपने बच्चों के सामने इंग्लिश चेनेल्स पर इंग्लिश फिल्मे और इंग्लिश कार्यक्रम देखते है और उनकी वाह वाह करते है. जब भी कोई हिंदी धारावाहिक आता है तो हम नाक भौं सिकोड़ते है और उनमे कमियां बताने लगते है, जैसे "टू लाउड", मेलोड्रामा" " जस्ट क्रेप " रोना धोना, इनके पास कुछ दीखाने को है ही नहीं, इत्यादि इत्यादि. यह सब बातें एक चलचित्र की तरह बच्चों के मानस पटल पर अंकित होती जाती है, और वह भी मन ही मन इंग्लिश को ही अपनी मात्र-भाषा मानने लगता है. अब जब यह बच्चे बड़े हो जाते है तो जो कॉन्वेंट में पढ़े लिखे होते है, उन्हें अच्छी अच्छी कंपनियों में उच्चे पदों पर जल्दी नौकरियां मिल जाती है और जो हिंदी माध्यम से पढ़ कर निकलते है, उन्हें छोटी मोटी नौकरी भी मिलनी मुश्किल हो जाती है. बस फिर से य़े दुष्चक्र चल पड़ता है और जो बच्चे हिंदी माध्यम से पढ़ कर निकले होते है, वो अपनी हालात के लिए अपने माँ बाप को ज़िम्मेदार ठहराते है और कसम खाते है की वो अपने बच्चों के भविष्य से कभी खिलवाड़ नहीं करेंगे और उन्हें इंग्लिश मीडियम कॉन्वेंट स्कूल में डालने का भरसक प्रयास करते है. आजकल तो रिक्शा चलाने वाला, घर का काम काज करने वाली माई भी अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूलों में दाखिल करने की कोशिश कर रहे है. उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं की उनका बच्चा वहाँ के माहौल में पनपेगा या मुरझा जायेगा.
इसमें भी कोई सन्देश नहीं की कॉन्वेंट स्कूलों में पढने वाले बच्चों को कई बार आपस में हिंदी या किसी और भाषा में बातचीत करने पर सजा भी दी जाती है. कोई भी अविभावक कॉन्वेंट स्कूल के इस आदेश के सामने कभी आवाज नहीं उठाता. अगर कोई कुछ बोलता है तो उसे यह कह कर चुप करा दिया जाता है क़ि यह यहाँ का रूल है. और यह इंग्लिश मीडियम स्कूल है अगर हम यहाँ स्टुडेंट्स को अन्य भाषायों में बातचीत करने देंगे तो वो कभी भी इंग्लिश नहीं सीख पाएंगे. यह भी कहा जाता है क़ि अगर आपको अपने बच्चे को हिंदी या कोई और भाषा सिखानी है तो उसे किसी सरकारी या भाषाई स्कूल में ले जाएँ. अब क्योंकि हर माँ-बाप का य़े ही सपना है क़ि उनका बच्चा बड़ा होकर अच्छी इंग्लिश में बातचीत करे तो वह चुप हो जाते है. इंग्लिश मीडियम स्कूलों में हिंदी अध्यापक क़ि कितनी दयनीय स्थिति होती है, यह बात किसी से छुप्पी नहीं है.
इंग्लिश मीडियम स्कूल या कॉन्वेंट में पढ़ा बच्चा जब बड़ा होकर कार्य-शेत्र में कदम रखता है तो वहाँ का सारा काम काज तो पहले से ही इंग्लिश में हो रहा होता है. इसलिए उस कार्य पद्धिति में सामने में अधिक समय नहीं लगता. अब तक वो यह भी भली भांति जान चुका होता है, क़ि अगर उसके माँ-बाप में उसे किसी सरकारी या हिंदी मीडियम स्कूल में पढाया होता तो आज उसके हाथ कोई इज्ज़त की नौकरी भी ना होती. अब हम कैसे उम्मीद करें इन लोगों से की वो अपनी संतानों को हिंदी भाषा में पढने के लिए प्रेरित करेंगे. यही पीढ़ी आगे चल कर देश की नीतियाँ निर्धारित करती है. हम किस मुहँ से इनसे कहें की वो हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार के लिए दिल से कार्य करें?
भाषा के सन्दर्भ में एक बात, जो बहुत महत्पूर्ण है और जिसे हम लोग अक्सर भूल जाते है, वो यह की जो भी भाषा पढने, लिखने और बोलने में आसान होगी, धीरे धीरे वही भाषा लोग अपनाने लगते है. पर अगर हम भारतवासी ही अपनी भाषा पर गर्वानित महसूस नहीं करेंगे तो और कौन करेगा. कहा चीनी, रुसी, अरबी, फ्रेंच, उक्रेनियन,जापानी, चेस्की, मलय, तमिल, तेलगु, मलयालम, आदि आसान भाषाएँ है. नहीं, कोई भी भाषा इंग्लिश से आसान नहीं है, पर इस विदेशी और देसी भाषायों को बोलने वाले अपनी भाषा पर गर्व करते है, और अपनी साधारण बोलचाल में तथा अपने घरो में अपने लोगों के साथ उसी भाषा में बातचीत करते है.
इंग्लिश मीडियम और कॉन्वेंट स्कूलों में पढने वाले बच्चों की मौलिक सोच भी बदल जाती है. जिस तरह हम हिंदी स्कूलों में पढ़े लिखे लोग कोई भी विषय या बात पहले हिंदी में सोचते है और फिर उसको इंग्लिश में अनुवाद करके उसे पेश करते है, कॉन्वेंट में पढ़े लिखे बच्चे इंग्लिश में ही मौलिक सोच रखते है. उन्हें टूटी फूटी हिंदी तो आती है लेकिन उससे ज्यादा कुछ नहीं. उन्हें अपने आप को समझाने के लिए किसी और भाषा की बैसाखी की कभी ज़रुरत ही महसूस नहीं होती.
हमें हिंदी को मात्र-भाषा या राष्ट्रीय भाषा के चंगुल से आज़ाद करना होगा. हमें यह जानना और कहना होगा क़ि हम हिंदी को इसलिए पढ़ते और लिखते है, क्योंकि यह एक सुन्दर अभिव्यक्ति की भाषा है, हम इससे इसलिए पसंद करते है, क्योंकि हिंदी हमारी सोच से जुडी है, हम इसे इसलिए पसंद करते है, क्योंकि यह हमारे विचारो को, हमारी भावनायों को, हमारे दुःख-दर्द और खुशियों को व्यक्त करने के लिए सबसे उपयुक्त माध्यम है. क्या अपने कभी किसी इंग्लिश गाने में वो भाव देखे है जो हिंदी गानों में अक्सर देखने को मिलते है?
हिंदी हमारे संस्कारो की भाषा है, हमारी सोच है. जब तक हम अपने देश से इंग्लिश को बाहर निकल नहीं पाएंगे, हिंदी को कभी उसका जन्म-सिद्ध अधिकार मिल ही नहीं सकता. उस अधिकार के लिए हमें अपने आपको पंजाबी, मराठी, तमिल, तेलुगु, गुजराती, आदि कहने से बचना होगा. जब तक हम लोग अपने आपको भारतीय नहीं कहने लगेंगे और यह नहीं कहेंगे क़ि हिंदी ही हमारी भाषा है, तब तक हिंदी का उत्थान होना असंभव सा लगता है
अंत में एक बात और. हम सभी जानते है क़ि हिंदी के पतन के कारण क्या है और हम सब कहीं न कहीं किसी ना किसी रूप में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में उसके लिए ज़िम्मेदार भी है. क्या कभी हम अपने अन्दर झांक कर देखेंगे क़ि हिंदी के पतन में हमारा अपना कितना दोष रहा है. क्या कोई पाठक, वर्तमान स्थिति को जानते हुए, यह चाहेगा क़ि उसके बच्चे हिंदी मीडियम स्कूलों में ही पढ़े, लिखे और आगे बड़े. अगर भारत देश में हिंदी को शुरू से ही उच्च स्तर पर बिठाया होता, तो आज उसकी स्थिति इतनी दयनीय ना होती. अगर हमारे देश में इंग्लिश मीडियम से पढ़े बच्चों को अच्छे रोजगार मिलने बंद हो जाए, तो देखें हमारे देश में कैसे कॉन्वेंट चलते है और कितने लोग इंग्लिश मीडियम में अपने बच्चों को पढ़ने भेजेंगे?
विनोद पासी "हंसकमल"
प्रशन यह उठता है, क़ि हम लोग क्यों अपने बच्चों से इंग्लिश में बातचीत करते है? उसका सीधा कारण है क़ि जिस भाषा में हम लोग अपने आप को सहज महसूस करते है, हम वही भाषा अपनी रोज मर्रा की ज़िन्दगी में भी प्रयोग करते है. अगर किसी बच्चे के माँ बाप कॉन्वेंट स्कूलों में पढ़े है तो निसंदेह उनके लिए इंग्लिश में बातचीत करना उतना ही सहज होगा जितना हिंदी स्कूलों में पढ़े लिखे लोगों के लिए हिंदी में बातचीत करना. इसका दूसरा प्रमुख कारण है क़ि हमारे देश में, बदकिस्मती से, इंग्लिश में बातचीत करने बालों को बहुत आदर से देखा जाता है. इसका एक साधारण सा उद्धारण है, किसी भी हिंदी भाषा के स्कूल में इंग्लिश भाषा के अध्यापक का सम्मान. होना तो बिलकुल इसका उल्टा चाहिए. ज़रा सोच कर देखो क्या किसी हिंदी भाषा के स्कूल में, हम फ्रेंच, स्पेनिश, मन्दारिन, रुसी या जर्मन भाषा के अध्यापक का उतना ही सम्मान करते है जितना इंग्लिश भाषा को पढ़ने वाले का? नहीं, बिलकुल नहीं. क्योंकि उन भाषायों को भारत में उतना आदर नहीं मिलता जितना की इंग्लिश को मिलता है.
जब हम अपने बच्चो के कॉन्वेंट स्कूलों में भेजते है, तो हम कहीं न कहीं उनके सुप्त मन में यह विचार पैदा कर देते है क़ि हम स्वयं अपनी मात्र-भाषा से या हिंदी से उतना प्यार नहीं करते,उसका इतना सम्मान नहीं करते, जितना हमें करना चाहिए. और यह बात बच्चा घर में हमारे व्यव्हार को देख समझ चुका होता है. हम अपने बच्चों के सामने इंग्लिश चेनेल्स पर इंग्लिश फिल्मे और इंग्लिश कार्यक्रम देखते है और उनकी वाह वाह करते है. जब भी कोई हिंदी धारावाहिक आता है तो हम नाक भौं सिकोड़ते है और उनमे कमियां बताने लगते है, जैसे "टू लाउड", मेलोड्रामा" " जस्ट क्रेप " रोना धोना, इनके पास कुछ दीखाने को है ही नहीं, इत्यादि इत्यादि. यह सब बातें एक चलचित्र की तरह बच्चों के मानस पटल पर अंकित होती जाती है, और वह भी मन ही मन इंग्लिश को ही अपनी मात्र-भाषा मानने लगता है. अब जब यह बच्चे बड़े हो जाते है तो जो कॉन्वेंट में पढ़े लिखे होते है, उन्हें अच्छी अच्छी कंपनियों में उच्चे पदों पर जल्दी नौकरियां मिल जाती है और जो हिंदी माध्यम से पढ़ कर निकलते है, उन्हें छोटी मोटी नौकरी भी मिलनी मुश्किल हो जाती है. बस फिर से य़े दुष्चक्र चल पड़ता है और जो बच्चे हिंदी माध्यम से पढ़ कर निकले होते है, वो अपनी हालात के लिए अपने माँ बाप को ज़िम्मेदार ठहराते है और कसम खाते है की वो अपने बच्चों के भविष्य से कभी खिलवाड़ नहीं करेंगे और उन्हें इंग्लिश मीडियम कॉन्वेंट स्कूल में डालने का भरसक प्रयास करते है. आजकल तो रिक्शा चलाने वाला, घर का काम काज करने वाली माई भी अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूलों में दाखिल करने की कोशिश कर रहे है. उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं की उनका बच्चा वहाँ के माहौल में पनपेगा या मुरझा जायेगा.
इसमें भी कोई सन्देश नहीं की कॉन्वेंट स्कूलों में पढने वाले बच्चों को कई बार आपस में हिंदी या किसी और भाषा में बातचीत करने पर सजा भी दी जाती है. कोई भी अविभावक कॉन्वेंट स्कूल के इस आदेश के सामने कभी आवाज नहीं उठाता. अगर कोई कुछ बोलता है तो उसे यह कह कर चुप करा दिया जाता है क़ि यह यहाँ का रूल है. और यह इंग्लिश मीडियम स्कूल है अगर हम यहाँ स्टुडेंट्स को अन्य भाषायों में बातचीत करने देंगे तो वो कभी भी इंग्लिश नहीं सीख पाएंगे. यह भी कहा जाता है क़ि अगर आपको अपने बच्चे को हिंदी या कोई और भाषा सिखानी है तो उसे किसी सरकारी या भाषाई स्कूल में ले जाएँ. अब क्योंकि हर माँ-बाप का य़े ही सपना है क़ि उनका बच्चा बड़ा होकर अच्छी इंग्लिश में बातचीत करे तो वह चुप हो जाते है. इंग्लिश मीडियम स्कूलों में हिंदी अध्यापक क़ि कितनी दयनीय स्थिति होती है, यह बात किसी से छुप्पी नहीं है.
इंग्लिश मीडियम स्कूल या कॉन्वेंट में पढ़ा बच्चा जब बड़ा होकर कार्य-शेत्र में कदम रखता है तो वहाँ का सारा काम काज तो पहले से ही इंग्लिश में हो रहा होता है. इसलिए उस कार्य पद्धिति में सामने में अधिक समय नहीं लगता. अब तक वो यह भी भली भांति जान चुका होता है, क़ि अगर उसके माँ-बाप में उसे किसी सरकारी या हिंदी मीडियम स्कूल में पढाया होता तो आज उसके हाथ कोई इज्ज़त की नौकरी भी ना होती. अब हम कैसे उम्मीद करें इन लोगों से की वो अपनी संतानों को हिंदी भाषा में पढने के लिए प्रेरित करेंगे. यही पीढ़ी आगे चल कर देश की नीतियाँ निर्धारित करती है. हम किस मुहँ से इनसे कहें की वो हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार के लिए दिल से कार्य करें?
भाषा के सन्दर्भ में एक बात, जो बहुत महत्पूर्ण है और जिसे हम लोग अक्सर भूल जाते है, वो यह की जो भी भाषा पढने, लिखने और बोलने में आसान होगी, धीरे धीरे वही भाषा लोग अपनाने लगते है. पर अगर हम भारतवासी ही अपनी भाषा पर गर्वानित महसूस नहीं करेंगे तो और कौन करेगा. कहा चीनी, रुसी, अरबी, फ्रेंच, उक्रेनियन,जापानी, चेस्की, मलय, तमिल, तेलगु, मलयालम, आदि आसान भाषाएँ है. नहीं, कोई भी भाषा इंग्लिश से आसान नहीं है, पर इस विदेशी और देसी भाषायों को बोलने वाले अपनी भाषा पर गर्व करते है, और अपनी साधारण बोलचाल में तथा अपने घरो में अपने लोगों के साथ उसी भाषा में बातचीत करते है.
इंग्लिश मीडियम और कॉन्वेंट स्कूलों में पढने वाले बच्चों की मौलिक सोच भी बदल जाती है. जिस तरह हम हिंदी स्कूलों में पढ़े लिखे लोग कोई भी विषय या बात पहले हिंदी में सोचते है और फिर उसको इंग्लिश में अनुवाद करके उसे पेश करते है, कॉन्वेंट में पढ़े लिखे बच्चे इंग्लिश में ही मौलिक सोच रखते है. उन्हें टूटी फूटी हिंदी तो आती है लेकिन उससे ज्यादा कुछ नहीं. उन्हें अपने आप को समझाने के लिए किसी और भाषा की बैसाखी की कभी ज़रुरत ही महसूस नहीं होती.
हमें हिंदी को मात्र-भाषा या राष्ट्रीय भाषा के चंगुल से आज़ाद करना होगा. हमें यह जानना और कहना होगा क़ि हम हिंदी को इसलिए पढ़ते और लिखते है, क्योंकि यह एक सुन्दर अभिव्यक्ति की भाषा है, हम इससे इसलिए पसंद करते है, क्योंकि हिंदी हमारी सोच से जुडी है, हम इसे इसलिए पसंद करते है, क्योंकि यह हमारे विचारो को, हमारी भावनायों को, हमारे दुःख-दर्द और खुशियों को व्यक्त करने के लिए सबसे उपयुक्त माध्यम है. क्या अपने कभी किसी इंग्लिश गाने में वो भाव देखे है जो हिंदी गानों में अक्सर देखने को मिलते है?
हिंदी हमारे संस्कारो की भाषा है, हमारी सोच है. जब तक हम अपने देश से इंग्लिश को बाहर निकल नहीं पाएंगे, हिंदी को कभी उसका जन्म-सिद्ध अधिकार मिल ही नहीं सकता. उस अधिकार के लिए हमें अपने आपको पंजाबी, मराठी, तमिल, तेलुगु, गुजराती, आदि कहने से बचना होगा. जब तक हम लोग अपने आपको भारतीय नहीं कहने लगेंगे और यह नहीं कहेंगे क़ि हिंदी ही हमारी भाषा है, तब तक हिंदी का उत्थान होना असंभव सा लगता है
अंत में एक बात और. हम सभी जानते है क़ि हिंदी के पतन के कारण क्या है और हम सब कहीं न कहीं किसी ना किसी रूप में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में उसके लिए ज़िम्मेदार भी है. क्या कभी हम अपने अन्दर झांक कर देखेंगे क़ि हिंदी के पतन में हमारा अपना कितना दोष रहा है. क्या कोई पाठक, वर्तमान स्थिति को जानते हुए, यह चाहेगा क़ि उसके बच्चे हिंदी मीडियम स्कूलों में ही पढ़े, लिखे और आगे बड़े. अगर भारत देश में हिंदी को शुरू से ही उच्च स्तर पर बिठाया होता, तो आज उसकी स्थिति इतनी दयनीय ना होती. अगर हमारे देश में इंग्लिश मीडियम से पढ़े बच्चों को अच्छे रोजगार मिलने बंद हो जाए, तो देखें हमारे देश में कैसे कॉन्वेंट चलते है और कितने लोग इंग्लिश मीडियम में अपने बच्चों को पढ़ने भेजेंगे?
विनोद पासी "हंसकमल"
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