Monday, 24 September 2012

कुरुनेगला(श्री लंका) में मनाये गए हिंदी दिवस( २५ .९.२०१२) पर मेरा सम्भोदन


मान्यवर अतिथियों, साथियों, हिंदी सीखने वाले बच्चों तथा अध्यापक गणों को मेरा नमस्कार, अयोवोबन, और वणक्कम,   

       आप सब को भारत के सहायक उच्चायोग, केंडी और भारत के उच्चायोग कोलोम्बो के तरफ से, तथा मेरी तरफ से हार्दिक बधाई. मुझे यह जान कर अति प्रसंता हो रही है क़ि कुरुनेगला में भी हिंदी भाषा को पढ़ाने  और पढने के लिए उतना ही जोश है जितना की श्री लंका के अन्य शहरो, जैसे कोलोम्बो, केंडी, कगाले, रतनापुरा, सबरामगुवा  तथा अन्य शेत्रो में है.  यह  सम्पूर्ण भारत के लिए एक बहुत हर्ष कि बात  है क़ि  श्री लंका में हिंदी के प्रचार और प्रसार के लिए पिछले कई वर्षो से अथक प्रयास किये जा रहे है.
मुझे यह जान कर अत्यंत ख़ुशी हो रही है क़ि  कुरुनेगला में श्रीमती अथिला  किशानी कोतलावल की अध्यक्षता में १०० से भी अधिक विद्यार्थी  विभिन्न  स्तरों (प्राथमिक, माध्यमिक और उच स्तरीय) पर   हिंदी भाषा का ज्ञान ले रहे है   श्री लंका के कई  और विश्व विद्यालयों    और  स्कूलों में हिंदी  भाषा को पड़ाने का भी विधिवत  कार्यक्रम  चल रहा  है. १४ सितम्बर, जो की भारत सरकार के द्वारा  निर्धारित हिंदी दिवस है, को हम लोग केंडी में हिंदी दिवस मना चुके है.  और आज  मुझे   आप लोगों के साथ यहाँ कुरुनेगला में हिंदी दिवस पर आने का सौभाग्य  प्राप्त हुआ है.  इसे आयोजन पर बुलाने   के लिए,   भारत का उच्चायोग, कोलोम्बो और भारत का सहायक उच्चायोग, केंडी, आप सब के बहुत बहुत  आभारी है.  आज से जब ९ मास पूर्व में श्री लंका में  आया था, तो मुझे इस बात का बिलकुल भी ज्ञान नहीं था, क़ि श्री लंका में हिंदी भाषा को जानने और समझने वाले इतने अधिक लोग होंगे.  यह मेरे लिए बहुत ही आश्चर्य की बात है क़ि श्री लंका में कत्थक नृत्य और हिंदी भाषा को सीखने में  सबसे अधिक सिंघलीस लोग ही है.  मैं चाहूँगा कि इस देश के तमिल और मुस्लिम भाई भी हिंदी भाषा और कत्थक नृत्य को सीखने में उतना ही योगदान दे.   जितना अधिक प्यार मैंने यहाँ के लोगों में भारत के प्रति देखा है, उतना मैंने अपने ३८  वर्ष के अनुभव में किसी और देश में नहीं देखा.  मुझे तो यहाँ आकर कभी लगा ही नहीं क़ि में किसी विदेश में हूँ.  हर समय ऐसे लगता है क़ि जैसे मैं दक्षिण भारत के किसी शहर में रह रहा  हूँ.

            सबसे पहले में आपको हिंदी दिवस के मनाने के बारे में कुछ जानकारी दे  दूं.  भारतीय
संविधान में हिन्दी को सर्वोच्च स्थान प्रदान किया गया है । 14 सितम्बर, 1949 को हिंदी को संघ की राजभाषा घोषित किया . तब से प्रतिवर्ष  14 सितंबर का दिन हिंदी दिवस के रुप में मनाया जाता है। क्योंकि इस दिन ही हिंदी को संघ की राजभाषा का स्थान मिला था इसलिए यह हर भारतीय के लिए  यह  गौरवपूर्ण दिन है। आज के दिन हम इसे पर्व के रुप में मना कर विश्व में हिंदी के प्रति जागृति उत्पन्न करने का प्रयास करते हैं। अनेक भाषाओं वाले हमारे देश में हिन्दी को एक संपर्क भाषा के रूप में तो अपनाया ही गया है इसके साथ ही में यह देख कर बहुत खुशी होती है कि  अनेक देशों में, सैकड़ों विश्वविद्यालयों और शैक्षिक संस्थानों में  भी हिन्दी पढ़ाई जा रही है और हिन्दी सीखने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है. शायद आपको ज्ञात होगा की कल ही   नौवें विश्व हिंदी सम्मेलन का , साउथ अफ्रीका के शहर, जोहानिसबर्ग में  समापन हुआ है, इस सम्मेलन में विश्व के कई देशों के राष्ट्राध्यक्ष और उनके प्रतिनिधि तथा हिन्दी प्रेमी, देश-विदेश से आए हिन्दी के विद्वान और हिन्दी सेवी, जिसमे श्री लंका से भी एक दल गया हुआ है,  मौजूद थे  . उन लोगों ने  इस बात पर भी चर्चा की , क़ि हिंदी भाषा को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने के लिए क्या क्या प्रयत्न  किये जाए. भारत की और से इस नौवें विश्व हिंदी सम्मेलन में विदेश मंत्रालय की राज्य मंत्री श्रीमती प्रणीत कौर ने अपने दल का नेतृत्व किया. आप लोगों को यह जान कर प्रसंता होगी की हिंदी विश्व में ५०० लाख लोगों द्वारा बोले जाने वाली, विश्व की तीसरी प्रमुख भाषा है.  ऐसे भाषा को बोलना, पढना और लिखना अपने आप में एक सौभाग्य  की बात है और आप सब बधाई के पात्र है

                     हर देश की अपनी राष्ट्रभाषा होती है। सारा सरकारी तथा अर्ध - सरकारी काम उसी भाषा में किया जाता है। वही शिक्षा का माध्यम भी है। कोई भी देश अपनी राष्ट्रभाषा के माध्यम से ही विकास पथ पर अग्रसर होता है। आज भारत के कई राज्य जैसे, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, बिहार, झार-खंड, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, उत्तरा- खंड आदि  नें हिंदी भाषा को सरकारी  काम काज की भाषा बना लिया है.   आज भारत के हर प्रान्त और श्रेत्र  का व्यक्ति हिंदी में बोल कर अपने आपको व्यक्त कर सकता है.पर जैसा की आप लोग जानते है  क़ि भारत के बाहर भी बहुत से देशो में हिंदी पढाई, बोली और समझी जाती है, जिनमे मुख्य देश है, श्री लंका,  मारीशस ,   फिजी, गयाना, त्रिनिडाड एवं टोबेगो , चेक रेपुब्लीक, उक्रैने, रशिया, नोर्वे, स्वीडन, फिनलैंड, इंग्लैंड, इटली, फ्रांस, कनाडा, अमेरिका, जर्मनी, रूस, मलेशिया, सिंगापूर, विएतनाम, कोरिया  , जापान,  पाकिस्तान, बंगलादेश,  नेपाल, कुवैत, सउदी अरेबिया, बहरीन इत्यादि.

                  आप में से कुछ  लोग जानते होंगे क़ि  भारत के हर प्रान्त, हर राज्य की अपनी एक अलग भाषा है, जैसे महाराष्ट्र में मराठी, पंजाब में पंजाबी, आंध्र प्रदेश में तेलगू, केरल में मलयालम, तमिल नाडू में तमिल, गुजरात में गुजराती, ओरिसा में उड़िया, जम्मू कश्मीर में डोगरी, गोवा में कोंकणी इत्यादि. यह भाषाएँ अपने अपने श्रेत्रो में बोली और समझी जाती है.  पूरे विशाल भारत में 48 से अधिक भाषाए बोली जाती है और उनमे से  22 से  अधिक भाषाएँ ऐसी है जिन्हें भारतीय सविधान के द्वारा  मान्यता  प्राप्त  है. पर पूरे देश को  एक ऐसी  भाषा की ज़रुरत थी , जिससे पूरे देश को एक डोर में बांधा जा सके. स्वत्रन्त्र भारत नें,  संस्कृत से निकली  हिंदी,  को ही  अपनी राष्ट्र भाषा चुना और देवनागरी लिपि को अपनाया. 

                 हिंदी भाषा  के प्रचार, प्रसार में अप्रतक्ष रूप से  अगर किसी का सबसे ज्यादा योगदान रहा है तो वो है भारतीय फिल्मे.  बॉलीवुड की   फिल्मो ने ऐसे  देशो  के लोगों के दिलो में भी अपने लिए जगह बना ली है, जहाँ के लोग हिंदी का एक शब्द भी  बोल, लिख या  पढ़  नहीं सकते.  हिंदी फिल्मो को यहाँ श्री लंका में भी बड़े शौक से देखा जाता है.  हिंदी फिल्मो के प्रसिद्ध होने का प्रमुख कारण उनका नृत्य, संगीत, और कलात्मक फोटोग्राफी, और उनका कहानी कहने का स्टाइल  है. हिंदी भाषा के  विदेशों में प्रचार प्रसार में , विदेशो में बसे भारतियों का और उन विदेशी नागरिकों का प्रमुख स्थान है जिन्होंने हिंदी भाषा का विधिवत अध्यन किया है और जो विदेशो में बसे विदेशियों को हिंदी भाषा क़ी शिक्षा दे रहे है.  पर मैं उनसे भी ज्यादा महत्व उन लोगों को देना चाहता हूँ जिन्होंने, विदेशी नागरिक होकर हिंदी को पढ़ा, लिखा और समझा और इससे अपने देश में फेलाने का बीड़ा उठाया.  श्री लंका में भी यह कार्य बहुत तेजी से चल रहा है और इसका सारा का सारा श्रे जाता है सिंहल भाषा क़ी  उन युवतियों को, जिन्होंने हिंदी के प्रचार  प्रसार में अपनी जी जान लगा दी है. यह कोई आसान कार्य नहीं है की  किसी विदेशी भाषा को पहले स्वयं सीखो, और फिर उस भाषा को अपने देश के नागरिकों को सिखायो.  उनके इस प्रयास के लिए मैं  श्री लंका के उन सभी हिंदी  अध्यापिकयों को प्रणाम करता हूँ.  


           हिंदी भाषा पर हजारो कवितायेँ लिखी गयी है लेकिन मैं यहाँ  आपको अपनी   कविता के कुछ अंश  सुनाना चाहता हूँ.

हिंदी भाषा  है  वो  धागा
जिसकी  माला ने  है  सब को बांधा
तमिल, तेलुगु, कन्नड़, डोगरी, मलयालम,
कोंकणी, मराठी, गुजराती,पंजाबी, बंगला,
संस्कृत, है सब  नवरत्न  मनके  इस माला के
यह भारतीय भाषाएँ   है चमकते सितारे
उस माला की  जो शोभ्यामान  है भारत माता के गले  में 
इस  माला को कभी तुम   बिखरने मत देना
आयो  मिलकर बनाये इतना  मज़बूत इस धागे को

क़ि  फिर कभी  किसी से य़े टूट न पाए
हिंदी है एक खिलता कमल, हिंदी की है आभा हर और
हिंदी गीत है, हिंदी ग़ज़ल, दिल पे राज करे य़े वो है हिंदी
इसको सीखों और  चमकायो, विश्व पटल पर छाप बनायो
विश्व पटल पर छाप बनायो, विश्व पटल पर छाप बनायो

        जैसा की आप सभी जानते है, आजकल सभी भाषायों में इंग्लिश के शब्दों की भरमार हो चुकी है, हिंदी, तमिल या सिंघला भाषा भी इसका अपवाद नहीं है. हिंदी में इंग्लिश के बड़ते प्रयोग पर, मेरा मन बहुत परेशां रहता है, मैंने उसे ही रेखांकित करते हुए  एक  कविता लिखी है ,  जिसका शीर्षक है " मेरे देश की भाषा" उसमे से मैं  यह चार पंक्तियाँ पढ़ रहा हूँ

"कभी फुर्सत में बैठकर सोचना
सोच सको जो तुम कभी
क्या कभी कोई देश,  विदेशी भाषा
की बैसाखियों पर चढ़ पहुंचा
है उन्नति के शिखर पर?
             

धन्यवाद

विनोद पासी "हंसकमल'
द्वितीय सचिव
भारत का सहायक उच्चायोग
केंडी(श्री लंका )

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