Tuesday, 25 September 2012

नवनिर्माण

नवनिर्माण
(ब्रह्मा कुमारिस के शिव बाबा के ज्ञान पर आधारित)

प्रथम पार्ट

मैं देख रहा हूँ अखिल विश्व में
रावण संस्कृति का जाल बिछा
जन त्राहि त्राहि कर रहा यहाँ
जन जीवन अस्त व्यस्त पड़ा


पाने को मन की शांति
मानव बेचैन सा तड़प रहा
और शांति की ही  ओड में
नए नए परमाणु परिषण कर रहा


धर्म नाम पर जनता को
बैठा ह्रिनाकश्यप हड़प रहा
अनगिनित  अनोखी चालों से
खोखला प्रजातंत्र पनप रहा

पापी हत्यारों के चंगुल में
जन पिस-पिसकर मर रहा
मानव को पिसता देख आज
दानव अपने कृत्यों पर हँस रहा

मेरी ही रही इस वसुंधरा पर
क्यों पापी जन पल फूल रहे?
क्यों पाप, इर्षा, द्वेष , हिंसा
स्वर्णिम झूलों में झूल रहे?

है आ रही आवाज मुझे
असह: करुण पुकारों की
मिट रहे निर्धनता - दुश्चक्र में
असंख्य निर्बल असहायों के

द्वितीय पार्ट

सावधान! ऐ दुष्ट मानवों
मैंने अब है अवतरण लिया
असहाए और अबलायों का
दुःख हरने का संकल्प लिया

पंच वासनायो से हटकर
जिसने मुझसे नाता जोड़ा
दे जीवन मुक्ति उसे षण में
सम्बन्ध स्वर्ग से सीधा जोड़ा

पहचान मुझे ! ऐ मूर्ख जन
मैं आत्म रूप, करता धर्ता
इस सृष्टि का संचालक भी
इस सृष्टि का संहारक भी

मैं तुझे समझाने आया हूँ
तू समझ सके जो थोडा सा
तू नारायण से कैसे नर बना
यह भेद तुझे समझाता हूँ

तू पूज्य से कैसे पुजारी बना
हीरे तुल्य जीवन तेरा
कैसे है कोडी तुल्य बना
स्वर्णिम युग से कैसे तू
इस कलयुग में है आन पड़ा

यह कल्प कल्पान्तर का चक्र है
ड्रामा समझ भूतकाल भुलाना है
कर पुरषार्थ तन मन धन  से
जो वैभव तुझको पाना है

तृतीय पार्ट

मैं नव-निर्माण हूँ कर रहा
रह बीच तुम्हारे कलयुग में
मैं पारखी    हीरे चुन  रहा  
मायाबी कोयलों की खानों से

मैं स्वर्ग धरा पर रच रहा
कर नष्ट पुराने कलयुग को
मैं पुष्प पुष्प ही चुन रहा
छांट कंटीले जंगलों को


मेरे स्वर्णिम सुन्दर संसार में
बसेंगे सुशील, सच्चे  मानव
वो घिरे रहेंगे योगाग्नि से
प्रवेश न कर पायेगा दानव कभी

उस नव-निर्मित संसार में
प्रजातान्त्रिक सरकार नहीं
राजा-प्रजा के बीच कभी
कोई वैमनस्य कोई तकरार नहीं

सर्वत्र शांति ही शांति
कहीं अशांति का नाम नहीं
स्वयं निर्मित सीमायों और
बन्धनों का नामोनिशान नहीं

नव-निर्माण मुझे करना है
स्वयं निर्माण तुझे करना होगा
सतयुग में  आने हेतु, तज सांसारिक
मोह माया, पुरषार्थ तुझे ही करना होगा

विनोद पासी "हंसकमल"




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