पिछले वर्ष 5 नवम्बर को भारत के एक अनमोल रत्ना भूपेन हजारिका ने मुंबई के कोकिलाबेन अस्पताल में 85 वर्ष की उम्र में अपने पार्थिव शरीर को तिलांजलि दी। उस समय मैं अपनी पत्नी के साथ असम राज्य में पर्यटन के लिए गया हुआ था। हम लोग 26.10.2011 (दिवाली के रोज) गुवाहटी पहुंचे थे और कुछ दिन गुवाहटी में रह कर शिलोंग, काजीरंगा राष्ट्रीय पार्क, शिव सागर, तेजपुर इत्यादि घूमकर गुवाहटी वापस आ रहे थे। तब तक मैं श्री भूपेन हजारिका जी को एक गायक और एक संगीतकार की दृष्टि से ही देखता था। उनका सिर्फ एक ही गीत सुना था जिसके बोल थे, "दिल हूम हूम करे" . वो कितने महान कलाकार थे और उत्तर-पूर्व के लोगों के दिलों में किस तरह राज करते थे, इसका अंदाज़ा तो मुझे उनकी मृत्यु के बाद ही हुआ। श्री भूपेन हजारिका जी की मृत्यु का समाचार हमें तेजपुर में ही मिल गया था। और उसी रोज हम तेजपुर से गुवाहटी के लिए निकल चुके थे।
हमें पूरे रास्ते में शाम 5 बजे के बाद हर चौक पर दीपावली जैसा दृश्य देखने को मिला। कई लोगों ने तो अपने घरो के बाहर दीपक जलाये हुए थे पर अक्सर हर चोराहे या किसी भी महत्वपूर्ण जगह पर गोलाई के आकार में या घडी की सुईयों की तरह सेंकडों दिए या मोमबतियां जलती हुईं मिली । कई जगह लोगो ने श्री हजारिका जी का चित्र भी चौक पर रखा हुआ था, जिससे हमें यह समझने में ज्यादा परेशानी नहीं हुई की यहाँ के लोग उनकी आत्मा की शांति के लिए दुआ कर रहे है। यह नज़ारा हमारे लिए कुछ अपरिचित सा था। लेकिन कहीं पर भी बिजली की लड़ियाँ जलती नहीं दिखाई दी . यह दृश्य हमें अगले 3-4 दिनों तक पूरे असम में देखने को मिला। कुछ सप्ताह पूर्व ही भारत के महान ग़ज़ल गायक श्री जगजीत सिंह का भी निधन हुआ था। जगजीत सिंह पूरे भारत वासियों के दिलो में राज करते थे उनके निधन पर हर हिन्दुस्तानी को बेहद दुःख हुआ था, मुझे भी हुआ था, क्योंकि वो हम दोनों पति पत्नी का सबसे चहेते गायक थे । पर हमें दिल्ली या किसी और शहर में ऐसा नज़ारा देखने को नहीं मिला था। मुझे इस बात का पूरा यकीन है कि उत्तर, मध्य या पश्चिम के किसी भी राज्य में हम लोगों ने कभी किसी महान आत्मा को इस तरह से विदा नहीं किया होगा ऐसा कुछ हुआ होता तो मीडिया से ज़रूर पता चल जाता।
गुवाहटी में हम लोग सर्किट हाउस में ठहरे थे। अगले ही दिन मुंबई से श्री हजारिका जी का पार्थिव शरीर गुवाहटी लाया गया और सर्किट हाउस के बिलकुल पास ही एक बड़े से स्टेडियम में उसे रखा गया। तीन दिनों तक पुरे शहर में मातम का माहौल था, और लोगो की भीड़ का तो अंदाज़ा भी लगाना असंभव था, लोग घंटो घंटो लाइन में लग कर उनके पार्थिव शरीर को भाव भीनी श्रधांजलि दे रहे थे। सारा शहर मानो किसी ख़ामोशी की चादर में लिपट गया हो और हर तरफ आँखों में नमी लिए हुए लोगो का हज़ूम ही नज़र आ रहा था।
वह दृश्य देख कर मुझे यह महसूस हुआ हमें अपने बिछुड़ जाने वाले लोगों को किस तरह से विदा करना चाहिए। काश हम अपने सभी महान कलाकारों को इस्सी तरह विदा कर सके। मेरा हर व्यक्ति से यह अनुरोध है की वो महान लोगो के स्वर्ग सिधारने पर अपने अपने घरो, चोराहो और मोहल्लों में इसी तरह दीप प्रजवालित कर उन्हें विदा करें। हमारी और से यह श्रधांजलि उन महान लोगों के लिए एक तुच्छ भेंट ही होगी, जो अपने जीवन काल में अपनी कला से हमारा मनोरंजन करते रहे। चलो आज से हम सब इस परम्परा को अपने अपने शहरो में शुरू करें
विनोद पासी "हंसकमल "
No comments:
Post a Comment