क्या होगा कभी ऐसी कविता का जन्म सखी
जिसके गर्भ से निकलेगा क्रांति का ज्वालामुखी
सदियों से हो रही है अंकुरित कविता कलम से
और दुनिया भी चल रही है अपनी ही समझ से
यह दोनों नदी के वो किनारे है जो कभी मिलते नहीं
एक किनारा दर्द समझाता है पर दूसरा सुनता नहीं
फिर भी कवितायेँ लिखी जा रही है, शोषण भी जारी है
कहानियां भी लिखी जा रही है, अत्याचार भी जारी है
हर लेखक समाज को बदलने को लालायित है
पर समाज है जिसने न बदलने की कसम खायी है
विनोद पासी "हंसकमल"
जिसके गर्भ से निकलेगा क्रांति का ज्वालामुखी
सदियों से हो रही है अंकुरित कविता कलम से
और दुनिया भी चल रही है अपनी ही समझ से
यह दोनों नदी के वो किनारे है जो कभी मिलते नहीं
एक किनारा दर्द समझाता है पर दूसरा सुनता नहीं
फिर भी कवितायेँ लिखी जा रही है, शोषण भी जारी है
कहानियां भी लिखी जा रही है, अत्याचार भी जारी है
हर लेखक समाज को बदलने को लालायित है
पर समाज है जिसने न बदलने की कसम खायी है
विनोद पासी "हंसकमल"
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