Wednesday, 24 October 2012

दाम्पत्य जीवन की नीवं





कभी कभी  मैं तुमसे कुछ
कहते कहते रुक जाता हूँ
डरता हूँ कि  कहूं कि न कहूं
सोचने लगता हूँ कि तुम  क्या
मतलब निकलोगी  मेरी बात का
अक्सर हम लोग  दूसरे  की
बात  समझे बिना ही
अपनी प्रतिक्रिया दे देते है

कई बार तुम भी तो कुछ कहते कहते
रुक जाती हो, होटों को सिल लेती हो,
कडवा घूँट पी लेती हो...
लिख कर भी दो तो उसका गलत
मतलब निकल आता है
परेशां मन कुछ सुनना नहीं चाहता
और बिना कहे मन में द्वन्द चलता रहता है
बेबुनियाद ख्याल पनपते रहते है  

पता नहीं हमें अपने पर विश्वास नहीं
या एक दुसरे पर विश्वास नहीं.....
पर ऐसा  कुछ ज़रूर है हमारे बीच
जो दिल की बात  जुबां पर आने नहीं देता

शायद हम एक दूसरे को अपने
शब्द-बाण से आहत नहीं करना चाहते
पर दूसरे को आहत न कर खुद
घुट घुट कर जीना भी तो ठीक नहीं,
बिन कहे बात न समझी जाये न समझाई जाये 


एक दूसरे पर विश्वास करने के लिए
ज़रूरी है हम अपने रिश्तो की बेल को सींचे,
उन्हें सुद्रढ़ बनाएं, उसकी नीवं मज़बूत करें
शक के परदे दिलो-दिमाग से बाहर फ़ेंक दे

कुछ प्रयत्न मैं करूँ, कुछ तुम करो  
तभी तो हम  मित्र बन बेझिजक
अपनी बात कह पाएंगे, तभी तो हम
इस अनमोल रिश्ते तो मजबूती दे पाएंगे 

विनोद पासी "हंसकमल" 

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