चाहे अब हार पहनायो रत्नों का या पुष्पों का
चाहे अब आंसू बहायो या रोयो धोयो घंटो भर
चाहे कितने ही कर्म कांड से पूजो इस देह को
जो तुम्हारा अपना था, वो छोड़ गया तुमको तभी,
जब ली थी उसने अपनी अंतिम स्वास
आंसू तो दिलो के गुबार बहा रहे है
सिसकियाँ तो चेतना वापस ला रही है
उस मिटटी की देह को कुछ भी नहीं एहसास
यह भी नहीं मालूम है कौन उसके आस-पास
चाहे पाँव छुओ या लगाओ तिलक , वो तो मुक्त
हुआ इन रीती रिवाजो से, उसका सफ़र हुआ पूरा,
अब मुड़ कर नहीं
लौटना है इस जन्म में
मालूम नहीं उसे स्वर्ग मिला या नरक,
हाँ मुक्ति मिली ज़रूर इस कष्टदायी शरीर से
विनोद पासी "हँसकमल "
मालूम नहीं उसे स्वर्ग मिला या नरक,
हाँ मुक्ति मिली ज़रूर इस कष्टदायी शरीर से
विनोद पासी "हँसकमल "
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