बड रहा आकार मेरा जिस अनुपात से
घट रहा है राम भी उसी अनुपात से
तुम भी सब हो मेरे जैसे अभिमानी ज्ञानी
जानकर भी अंजान बन, कर रहे हो मनमानी
नासमझी में क्यों बड़ा रहे हो मेरा आकार विशाल
क्यों नहीं करते अपने मन में राम का विस्तार
मैं कागज़, लकड़ी, पटाखों का बुत नहीं, जो जल जाऊं
मैं तुम्हारा ही अक्स हूँ, जो अन्दर से ही खा जाऊं
मैं व्यभाचारी नहीं था, पर छा गया
अभिमान
मेरी मुक्ति के लिए मिला था राम को बनवास
पहचानो बड़ते मेरे प्रभाव को, करो मुझे तुम छोटा
वर्ना नहीं मिलेगा कोई राम जब, वो दिन होगा खोटा
मेरा बढता रूप दर्पण है सामाजिक कुरीतियों का,
विजय-दशमी मनानी है तो दमन करो उन विचारो का
इस कविता में राम हमारे नेसर्गिक गुणों(जैसे निश्छल प्रेम, श्रधा, परोपकार,
दया, सहानुभूति, दूसरों की इज्जत, आदि का
प्रतीक है) और रावण हमारे अन्दर व्याप्त
विकारो ( जैसे काम, क्रोध, लोभ, मोह,
अहंकार, नफरत, द्वेष, इर्षा, लालच, आदि )
का रूप है.
विनोद पासी “हंसकमल”
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