पिछले
२५-३० वर्षो के ‘एडस’ दुनिया के सामने एक सबसे बड़ी और
लाइलाज बीमारी के रूप में उभरी है. विश्व के हर देश में इस बीमारी के बारे में और उससे बचने
के लिए व्यापक रूप से प्रचार-प्रसार किया जा रहा है, जो काफी हद तक इसके बारे में
उचित जानकारी देने में समर्थ है. पर फिर भी अभी बहुत से लोग इसके बारे में कम
जानकारी रखते है या उन्हें इसके दूरगामी परिणामो का पूर्णता आभास नहीं है. इनमे से
अधिकांश युवा वर्ग के लोग है. ‘एडस’
जैसी बीमारी का हिंदी में कोई नाम ही नहीं
हैं यह तो इंग्लिश में प्रचलित एक ऐसी बीमारी का फुल फॉर्म है, जो काफी समय तक डॉक्टरों
को भी नहीं मालूम थी, क्योंकि मेडिकल में इस बीमारी के बारे में किसी को कुछ पता
ही नहीं था, इसलिए अंग्रेजी में इसे कहा
गया Acquired Immune Deficiency
Syndrome (AIDS) जिसका साधारण
भाषा में अर्थ है कि ऐसे तत्वों(वाइरस) को
शरीर द्वारा अपना लेना, जिनसे वह लड़ने में
अक्षम है. जब भी हमें कोई बीमारी होती है
तो वो दवा से या आराम करने से कुछ दिनों में ठीक हो जाती है क्योंकि हमारे शरीर के
अन्दर बीमारियों से लड़ने की आन्तरिक शक्ति होती है और वो उन जीवनुयों को नष्ट कर
देती है जो हमारे अस्थाई रूप से हमारे शरीर में प्रवेश कर गए है. अक्सर यह बाहरी
कीटाणु शरीर में प्रवेश करते ही हमें बीमार कर देते है और हम जल्दी से जल्दी इनसे
छुटकारा पाने के लिए डॉक्टर के पास जाते है या कोई घरेलू उपचार करने लगते है. इनका यह युद्ध कुछ दिन या सप्ताह चलता है और फिर
बुराई पर अच्छाई की जीत होती है और हम स्वस्थ होकर अपने कामकाज पर फिर से गतिशील
हो जाते है.
परन्तु ‘एडस’ के साथ ऐसा नहीं
है. इसका वाइरस शरीर में एक बार घुस गया
तो वह जाकर एक किसी चोर की भांति बहुत कई वर्षो तक उसमे छुपा रहता है. हमें इसकी उपस्थिति का आभास भी
नहीं होता क्योंकि यह हमारे देनिक कार्यो में
कोई दखल नहीं डालता और न ही हमारे को कोई परेशानी या शारीरिक दुर्बलता का
एहसास होता है. पर सबसे अधिक महत्वपूर्ण
बात ध्यान देने लायक यह है कि यह हमारी
ज़रा सी असावधानी से ही हमारे शरीर में प्रवेश हो सकता है, नहीं तो किसी संक्रमण
की वजह से यह कभी हमारे शरीर में प्रवेश नहीं कर सकता.
‘एडस’ का वाइरस अक्सर हमारे शरीर में कई महीनो
या वर्षो तक सुप्त अवस्था में पड़ा रहता है. इन्हें साधारणत सात से दस वर्ष का समय लगता है अपना प्रभाव दिखने
में. इसके कुछ लक्षण है, जैसे
१. एक महीने या उससे भी अधिक लगातार खांसी रहना
२. जांघ पर या किसी और जगह तीन महीने से भी ज्यादा
किसी प्रकार की गांठ का रहना
३. काफी
कम समय में शरीर का वजन १० प्रतिशत या उससे अधिक घट जाना
४. दस्त
का बहुत देर तक ठीक न होना.
५.
लम्बे समय तक साधारण बुखार का ठीक न होना.
तब डॉक्टर
रोगी के
रक्त की HIV जाँच करवाते है और अगर आपका रक्त HIV+ निकला, तो उसका मतलब है कि यह वाइरस आपके शरीर में प्रवेश कर चुका है. एच.आई.वी. का अर्थ है हयूमन
इम्यूनो डिफीसिएंसी वायरस. यह वायरस के उस वर्ग से संबंध रखता है जिसे रेट्रो-वायरस
कहते हैं तथा यह इतना छोटा होता है कि इसे साधारण माइक्रोस्कोप से भी नही देखा जा
सकता.
एच.आई.वी. वायरस किसी व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर जाता तो काफी तेजी से बदने लगता और धीरे-धीरे रक्त की सफेद कोशिकाओं को नष्ट कर देता जिसपर शरीर की रोगों से लडने की क्षमता निर्भर करती है.
एच.आई.वी. वायरस मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं एच.आई.वी. -1 और एच.आई.वी.-2. भारत में अधिकतर व्यक्ति एच.आई.वी. -1 से ग्रसित हैं.
एच.आई.वी.(+) के रोगी को ‘एड्स’ होने की सम्भावना है, परन्तु यह HIV+ कब आपके शरीर
में एडस को पूर्णत फेलाएगा, यह उस समय नहीं कहा जा सकता. धीरे धीरे यह वाइरस हमारे शरीर में अपनी संख्या बढाना शुरू करता है
और हमारे शरीर के अन्दर मौजूद रक्षा तंत्र यानि सफ़ेद सेल्स ( white cells) को बर्बाद करना शुरू कर देता है इसकी संख्या की
वृद्धि, एक दो तीन, चार, पांच, जैसे नहीं होती, यह एक से दो, दो से चार, चार से
आठ, आठ से सोलह, सोलह से बतीस, बतीस से चौसठ, जैसे बढती है और जैसे जैसे हमारे
शरीर के रक्षा तंत्र
यानि सफ़ेद सेल्स कम होने लगते
है, हमारा शरीर सूख कर काटें जैसे जो जाता है, क्योंकि अब उस के प्रतिरोधक शक्ति
को यह वायरस खत्म कर चूका होता है और उस पर कोई भी दवा का असर नहीं हो रहा होता.
मानव शरीर के रक्त में मौजूद श्वेत रक्त
कोशिकाएं, शरीर को संक्रमण तथा रोगों से लडने की
शक्ति प्रदान करती है. एच.आई.वी. वायरस इन्हीं श्वेत रक्त कोशिकाओं, जिन्हें लिम्फोसाईट के नाम से भी जाना जाता है, को नष्ट करतीं हैं. रक्त में इन कोशिकाओं की संख्या हीं संक्रमण की स्थिती
को निर्धारित करती है. जैसे -जैसे
रक्त में लिम्फोसाईट कोशिकाओं की संख्या कम होती जाती है वैसे ही संक्रमण
का प्रभाव दिखने लगता है.
१. एच.आई.वी.संक्रमण होने पर यह वायरस श्वेत रक्त कोशिकाओं को नष्ट कर, प्रतिरोधात्मक शक्ति को कम कर देता है.
२. एच.आई.वी. संक्रमण के कारण जितनी तेजी में श्वेत रक्त कोशिकाएं नष्ट होतीं हैं, उतनी हीं तेजी से शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति भी कम होते जाती है.
३ . प्रतिरोधात्मक शक्ति कम होने से शरीर में बीमारियों से लडने की क्षमता कम हो जाती है और व्यक्ति अनेक प्रकार के संक्रमण का शिकार होने लगता है. संक्रमण की इस अवस्था को एड्स की अवस्था भी कहते हैं.
इस बात पर
काफी खोज हो चुकी है कि यह वायरस इंसान के शरीर में आया कैसे. प्रचलित वैज्ञानिक धारणा के अनुसार, यह वायरस बंदरो के शरीर में
पाया जाता है जो उन्हें जीवित रहने में उनकी मदद करता है. पर
प्रशन यही उठता है कि इंसानी शरीर में इसका प्रवेश कैसे हुआ होगा. एक तो यह कि अगर बन्दर इंसान को काट ले, तो
उससे इन्सान के शरीर में इसका प्रवेश हो सकता है.
पर अनुसन्धान कर्तायों का यह मानना है कि अफ्रीका के कुछ देशो में इंसान
बंदरो का शिकार करते है और उनके मीट को खाते है.
कभी कभी यह मीट पूरी तरह से पका हुआ नहीं
होता, जिससे यह वायरस वहां के निवासियों
के शरीर में प्रवेश कर गया होगा.
उसके बाद धीरे धीरे इसने और लोगों के शरीर में भी प्रवेश करना शुरू कर
दिया.
सबसे महत्पूर्ण बात तो
यह है की यह हमारे शरीर में प्रवेश कैसे
करता है. इसके प्रवेश करने के कुछ रास्ते
है, जिनमे से प्रमुख इस प्रकार है:-
|
|
||||
|
|
||||
|
एच. आई. वी. का वायरस मानव शरीर में वीर्य, योनि-द्रव्य और रक्त के माध्यम से फैलता है. संक्रमित
व्यक्ति के शारीरिक द्रव्यों का अन्य व्यक्ति के रक्त के साथ संपर्क होने से एच.आई.
वी. संक्रमण होने की संभावना होती है, जो निम्नलिखित
प्रकार से हो सकता हैः
असुरक्षित संभोग सेः किसी अनजान व्यक्ति (पुरुष या महिला से) बिना ऐतिहात बरते शारीरिक सम्बन्ध बनाना. इंसान के अन्दर सबसे सशक्त अगर कोई इच्छा है तो वह है अपने से विपरीत लिंग के व्यक्ति के साथ सम्भोग करना. इसे सेक्स या रति-क्रीडा कहा जाता है. इंसान ही एक ऐसा जीव है जो आनंद के लिए, या दूसरे पर अपना अधिकार सिद्ध करने के लिए सेक्स करता है. सम्भोग अपने आप में बुरा नहीं है, सदियों से लोग एक दूसरे से सेक्स करते आ रहे है पर पहले उन्हें सिर्फ यौन रोगों का ही भय था, जिनमे से कई बीमारियों का समय रहते इलाज हो जाता था, और कोई इतनी भयंकर रूप ले चुकी होती थी, कि उससे निजात पाना मुश्किल हो जाता था. अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, और यूरोप के लगभग सभी देशो में लोग सेक्स के प्रति बहुत जागरूक है और उन्हें पर-स्त्री या पर-पुरुष के साथ सेक्स करने में कोई परहेज भी नहीं होता. उनकी यह ज़रुरत भी है, क्योंकि वहां शादी व्याह का बंधन सात जन्मो के लिए आत्मायों का मिलन नहीं है, बल्कि एक दूसरे को खुश रखना और खुश करना ही उनकी ज़िन्दगी का मूल मंत्र है. अक्सर वहां के लोग अपने जीवन काल में ३-४ बार शादी तो कर ही लेते है या एक दूसरे से तलाक लेने के बाद अकेले अपनी ज़िन्दगी को जीने में विश्वास रखते है,
स्त्री के योनि क्षेत्र तथा पुरुष के
प्रजनन अंगों की बनावट ऐसी होती है जिससे होकर आसानी से एच.आई.वी. संक्रमण शरीर
के अंदर प्रवेश कर सकता है. इसके अलावां प्रजनन एवं यौन अंगों के आस -पास रक्त
का संचार काफी अधिक होता है जिससे एच.आई.वी. संक्रमण का रक्त मे मिल जाने की
संभावना काफी अधिक हो जाती है.
इसके अतिरिक्त योनि या शिश्न का कोई भाग
कट या फट गया हो और इस हालात में असुरक्षित संभोग किया जाए तो व्यक्ति के एच् आई
वी संक्रमित होने की संभावना काफी अधिक हो जाती है. अतः एच.आई.वी. से बचाव के
लिए हमेशा सुरक्षित संभोग की सलाह दी जाती है, जिसमें संक्रमित
व्यक्ति का शारीरिक द्रव्य दूसरे यौन साथी के शरीर में न जा पाए.
भारत
के नौजवान लोग भी अब एक दूसरे से शारीरिक सम्बन्ध बनाने में बहुत अधिक दिलचस्पी लेने लगे है, और कई बार
भावावेश में, या एक दूसरे की रजामंदी से कंडोम का प्रयोग नहीं करते. इसके
दुष्परिणाम काफी देर से देखने को मिलते है. यह नहीं कि हर व्यक्ति जो किसी अंजान
व्यक्ति से बिना कंडोम के सम्भोग करता
है, वह ‘एडस’ का शिकार ज़रूर
होगा, पर फिर भी इन लोगो की ‘एडस’ की चपेट में आने
की सम्भावना ज़रूर बड जाती है. जो लोग
अपने साथी से ही सम्भोग करते है, या केवल आपस में ही सम्भोग करते है, उन्हें
इसका डर नहीं पर अगर कभी आप किसी अंजान पुरुष या महिला से बिना कंडोम सम्भोग
करते है, तो इसकी सम्भावना बढ़ जाती है,
क्योंकि आपको नहीं पता कि वह स्त्री या पुरुष कितने और लोगों से शारीरिक सम्बन्ध
बना चुके है या आगे चलकर कितने और लोगो से अपने शारीरिक सम्बन्ध बनायेगे.
उस
समाज की इसी ज़रुरत को ध्यान में रखते हुए, और यौन रोगों तथा अनचाहे प्रसव से बचने के लिए कंडोम का अविष्कार हुआ. कंडोम के आने के बाद तो सेक्स का आनंद लेने का जो सिलसिला शुरू हुआ,
उसको रोक पाना किसी के बस की बात नहीं रही. भारत में भी आजकल कंडोम्स तथा अनचाही
प्रेगनेंसी को रोकने के लिए विज्ञापनों की जैसे होड़ सी लगी हुई है. ‘एड्स’ से बचने के लिए तो इनकी बिक्री में अस्म्यान्य रुप
से बढोतरी हुईं है. आज का युवा वर्ग बहुत बिंदास ज़िन्दगी जी रहा है, और उसे नए
नए एक्सपेरिमेंट करने में भी कोई हिचक नहीं है.
अभी तक यह इस भयंकर बीमारी से
बचने का अगर कोई सबसे कारगर तरीका सिद्ध हुआ
है तो वह कंडोम ही है, हालाँकि यह भी १००% सेफ नहीं है
.
|
इसी
तरह आजकल लड़कियों और लड़कों के द्वारा
अपने बदन पर टटूस बनवाने का एक फैशन सा चल पड़ा है, मेरी उन सब लडको और लड़कियों
को सलाह है कि टटूस बनवाते समय यह सुनिश्चित कर लें की वो सुई
किसी और व्यक्ति पर इस्तेमाल न की गयी हो, और आप पर इस्तेमाल करने के बाद उस सुई
को भी फ़ेंक दिया जाये.
अभी तक
इस बीमारी का कोई इलाज पूरी दुनिया में
उपलब्ध नहीं है ! इसलिए
सिर्फ बचाव ही इसका इलाज है!
हाँ कुछ ऐसी दवाइयां जरूर आ गयीं हैं जिनसे एड्स के रोगी का
जीवन कुछ समय के लिए या कुछ सालों के लिए और बढाया जा सकता है लेकिन यह बहुत महँगा है और हर किस्सी के बस कि बात
नहीं !
एड्स
से बचने का बस एक ही इलाज़ है और वह कि अपने
जीवन साथी या एक ही प्रेमी-प्रेमिका के साथ अपने शारीरिक संबंधो को सीमित
रखना. अगर आपको हमेशा अपना हम-बिस्तर बदलने का इतना ही शौक है, तो अपने साथी और बच्चों की खातिर हमेशा
कंडोम का प्रयोग करे. हमेशा इस्तेमाल करके फ़ेंक देने वाली सुई का ही प्रयोग करें, अपने नाई से उस्तरे में नया ब्लेड इस्तेमाल करने को कहें; अप्राकृतिक सेक्स तथा दृग्स के नशे की लत से बचें, कभी बाज़ार से खून लेना पड़े तो एड्स की जाँच जरूर करवा लें.
__________
No comments:
Post a Comment