Monday, 20 May 2013

प्रणय सूत्र


जब बंधो किसी के प्रणय सूत्र में
मत देखो उसका शरिरिक आकर्षण
न निहारो उसे पल पल तुम
उस पर कर दो सब कुर्बान तुम

वैवाहिक जीवन के शुरुआती वर्षो में
एक पले-पलाएं जवान पौधे को
रौपना पड़ता है अपने आँगन में
सींचना पड़ता है निस्वार्थ भाव से
जिससे जड़े पकड़ सके मिटटी को

करो सदा सम्पूर्ण समर्पण
और करो सम्मान विचारो का
अगर कुछ समझाना भी पड़े
तो समझाओ प्यार मनुहार से
अवसाद न इसमें आने दो
कभी न मानो गलत विचार
जो कर दे तुम्हारी बुद्धि भ्रष्ट

यह रिश्ता सबसे नाज़ुक है
टूटता भी सबसे पहले है
हर पल सींचना पड़ता है
इस रिश्ते की मिटटी को
कभी इसे हलके में न लेना
नहीं तो पड़ेगा जीवन भर रोना

अपनी “मैं” को दफना कर
एक दुसरे का सम्मान करो
वर्ना छूट सकता है साथ कभी भी
पुरानी यादों में जीने के लिए

विनोद पासी “हंसकमल”

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