आज फिर मन में एक आग लगी हुई है
फिर एक नन्ही कली वहशत का शिकार हुई है
हर तरफ उन्माद है इन्साफ मांगने वालो का
पर इंसाफ कैसे और क्या मिलेगा उसे
जिसका जीना दुश्वार हो गया हो,
वो कहते है भीड़ का उन्माद ठीक नहीं
कानून अपने हाथ में लेना ठीक नहीं
नहीं उम्मीद व्यवस्था से कोई न्याय की
आरोपी को कर दो गुस्साई जनता के हवाले.
वो खुद छीन लेगी उसके मुहं से नवाले
दोषी समाज नहीं, दोषी है यह भक्षक पुलिस
जो रिश्वत लेती -देती है चुप कराने को
दोषी है वो मानसिक रोगी जो हर रोज दिल्ली
को दूषित करने आ बसते है रोजगार के बहाने
रोक दो इन बीमार राज्यों के बाशिंदों को
नहीं ज़रुरत है, इनकी दिल्ली को
नहीं चाहते की वो आयें हमारी दिल्ली में
दिल्ली पनाहगार है कामगारों की, न की वहशियों की
अपने कुकर्मो से मत बदनाम करो मेरी दिल्ली को
गरीबी अमान्शुता का रूप नहीं हो सकती
संभालो अपने आप को अपने राज्यों में
जो पिछड़े है तुम्हारे नेतायों की वजह से
जो खेरात मांगते है, गरीबी के नाम पर
चंद लोगो को फांसी पर लटका देने से
वहशीपन दूर होगा, इसमें मुझे संदेह है
ज़रुरत है इनके सामाजिक बहिष्कार की
इन्हें नपुसक बना के छोड़ देने की
इनके माथो पर जुर्म खुदवा देने की
इन्हें अँधा बना कर छोड़ देने की
काश आज भी कोई कालापानी होता
जहाँ हम फ़ेंक सकते इन दरिंदो को
नहीं चाहते यह रहे जिंदा हमारी सभ्यता
और संस्कारो का चीर हरण करके
विनोद पासी "हँसकमल"
फिर एक नन्ही कली वहशत का शिकार हुई है
हर तरफ उन्माद है इन्साफ मांगने वालो का
पर इंसाफ कैसे और क्या मिलेगा उसे
जिसका जीना दुश्वार हो गया हो,
वो कहते है भीड़ का उन्माद ठीक नहीं
कानून अपने हाथ में लेना ठीक नहीं
नहीं उम्मीद व्यवस्था से कोई न्याय की
आरोपी को कर दो गुस्साई जनता के हवाले.
वो खुद छीन लेगी उसके मुहं से नवाले
दोषी समाज नहीं, दोषी है यह भक्षक पुलिस
जो रिश्वत लेती -देती है चुप कराने को
दोषी है वो मानसिक रोगी जो हर रोज दिल्ली
को दूषित करने आ बसते है रोजगार के बहाने
रोक दो इन बीमार राज्यों के बाशिंदों को
नहीं ज़रुरत है, इनकी दिल्ली को
नहीं चाहते की वो आयें हमारी दिल्ली में
दिल्ली पनाहगार है कामगारों की, न की वहशियों की
अपने कुकर्मो से मत बदनाम करो मेरी दिल्ली को
गरीबी अमान्शुता का रूप नहीं हो सकती
संभालो अपने आप को अपने राज्यों में
जो पिछड़े है तुम्हारे नेतायों की वजह से
जो खेरात मांगते है, गरीबी के नाम पर
चंद लोगो को फांसी पर लटका देने से
वहशीपन दूर होगा, इसमें मुझे संदेह है
ज़रुरत है इनके सामाजिक बहिष्कार की
इन्हें नपुसक बना के छोड़ देने की
इनके माथो पर जुर्म खुदवा देने की
इन्हें अँधा बना कर छोड़ देने की
काश आज भी कोई कालापानी होता
जहाँ हम फ़ेंक सकते इन दरिंदो को
नहीं चाहते यह रहे जिंदा हमारी सभ्यता
और संस्कारो का चीर हरण करके
विनोद पासी "हँसकमल"
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