Wednesday, 12 June 2013

व्यंग

वाह से फेसबुक, वाह से गूगल,
हर कोई बन गया अब लेखक
न कोई पाठक, न कोई संपादक
न कोई समीक्षक, न कोई अध्यापक

झट मंगनी और पट व्याह की तर्ज़ पर
कुछ भी लिखो, मिनटों में छप जाये
अनजान लाइक्स की लाइन लग जाये
हर रोज बन रहे है नए नए ग्रुप्स
वही सदस्य और वही लोग, होड़ लगी है
हर रोज छप रही है सेंकडो कविताये
पता नहीं कोई उन्हें गुने या समझे
खुद पर कवि होने का भ्रम छा जाये
वाह से फेसबुक वाह से गूगल

विनोद पासी “हंस्कमल”

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