देह की आज़ादी
अकेली औरत
कभी नहीं भूल पाती
जाड़े के वो ठिठुरते
दिन
और ठण्ड से जमी
रातें
जब प्यार को
देह से बाँटने के
बाद
बगल में पड़े पति के
शुरुआती
खर्राटों की
धीमी से आहट सुनकर
वह हल्के से उसका
हाथ
अपने बदन से हटाती
थी
की उसकी नींद में
खलल डाले
बगैर वह उठे और पहन
से कपडे अपने
पर ज़रा सा सरकते हुए
ही
और कस जाती थी
पति की बाँहों की
जकडन
और कमर घेर लेती थी
उसकी टाँगे
सर्दी के रात को
ठिठुरते
कम्बल को कसने की
नाकाम कोशिश में
वो कहीं न कहीं
उद्धरती चली जाती थी
और सारी रात यूं ही
ठंडी हवा से
आंख मिचोली करते बीत
जाती थी
वर्फीली रात को रात
भर अपनी देह में समाकर
सुबह शिला सी अकड़ी
देह लेकर भी
औरत अपने भीतर
मुस्काती थी
ऑंखें नाम तो जाती
थी
अपने पति के प्यार
पर गर्व से फूल जाती
जो उसे नागपाश में
जकड़े बिना
पल भर के लिए भी सो
नहीं पाता था
पांच दिन की कौन कहे
पांच मिनट के लिए भी
छोड़ नहीं पाता
***
पांच साल बाद
एक दिन उसने ऐसा
छोड़ा
की सबने कहा – तू भी छोड़ दे उसे
किसी और का हाथ थाम
ले
पहाड़ सी ज़िन्दगी
सामने पड़ी है
और ठीठोली करता समाज
कितनो को जवाब देगी
देगी तू
यह उम्र निकल गयी
तो कोई नहीं देगा
आवाज
उसे थामने को आगे
बड़े
सामने थे कई हाथ
औरत ठिठकी, थमी,
सोचा,
अपने को भीतर तक टहोका,
उसके भीतर कई रातें
बजती हैं
और वह कांप जाती है
उसे नहीं चाहिए एक
और नागपाश,
वर्फीली हवा में देह
की ठिठुरन
टांगो और बाँहों में मजबूती से कैद
अपनी निर्वस्त्र देह
वश कडकती ठण्ड की
रात में
सर्द हवायों को परे धकेलती
रजाई कस कर औद्द
लेती है
और उस गर्माहट में
अपनी देह को
महफूज़ पाती है
अकेली औरत
रात भर कपडे पहनकर
सोने की आज़ादी चाहती
है
सुधा अरोड़ा जी की
कविता “रचना समय” के सोजन्य से ली गई
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