Saturday, 30 June 2012

मेरी नियति

मेरी नियति
जिसने मुझे दिया सहारा, उसने ही छोड़ा मझदार में
पहना के बेड़ियाँ  पावों में, बांध दिया इक  खूटे से
फिर छोड़ दिया लांछन लगा, नहीं  जानता है  वो शायद ,
ज़ख़्म भर जाते है वक्त के साथ साथ
पर नहीं भरती रूह   छिल जाने के बाद
कभी नहीं,  कभी नहीं.....

उसने ढून्ढ लिया खुद  जीने का साधन
और मुझे छोड़ दिया, अंधेरो में भटकने को
मुझ पर है हर बंदिश और शालीनता का लिबास
काश उसको भी होता मेरी ज़रूरतों का एहसास
काश कभी होता  उसे अपने किये पे पछतावा, 
न भी मांगे माफ़ी मुझसे, बस हाथ पकड़ ले मेरा,
मैं समझ जायूंगी उसका टूटता गरूर, उसका इशारा
मैं भूल जाऊंगी,   अपने सारे ज़ख्म 
मैं भूल जाऊंगी,  सारे दुःख दर्द


मैं  अर्धांगिनी  होकर भी हो रही  परायी
और वो कुछ ना होकर भी बन गयी उसकी अपनी
अच्छा होता अगर मुझे जलील करने से पहले
मुझे आज़ाद कर दिया होता इस दोजख से

मैं भी  हूँ एक हाड मांस का पुतला,
धड़कता है   मेरा भी ह्रदय किसी  के लिए
जीना चाहती हूँ मैं भी  किसी के लिए
बनना चाहती हूँ मैं भी किसी की
छेड़ना चाहती हूँ उसे, एक औरत  की तरह
परोसना चाहती हूँ उसे अपने हाथों से
बिताना चाहती हूँ कुछ  पल उसके साथ
जो मुझे समझता है, पर वो मुझको ही
समझाता है, अपनी दुनिया से बाहर नहीं आता
वो मेरा मित्र है, हमसफ़र नहीं
शायद यही मेरी नियति है
शायद यही मेरी नियति है

विनोद पासी "हंसकमल"

No comments:

Post a Comment