कभी एक पल भी भारी पड़ता है
और कभी ज़िन्दगी गुज़र जाती है
एक पल में
कितनी अजीबो गरीब है यह ज़िन्दगी
कभी
खट्टी, कभी मीठी, कभी फीकी
फिर भी अच्छी है ज़िन्दगी,
न होने से
विनोद
पासी "हंसकमल"
मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है. मुझे ब्लॉग बनाना तो नहीं आता, पर मैंने यहाँ पर अपनी अधिकांश कवितायेँ, सन्देश, कुछ लघु कथाये इत्यादि को संकलित किया है . मेरी पहली पुस्तक "ऐसे में कविता कैसे हो" जुलाई २०११ में गरिमा बुक्स, शाहदरा, दिल्ली, द्वारा प्रकाशित हो चुकी है, इन कवितायों में कुछ रचनाये है जो मेरी पुस्तक में छ्प चुकी है शेष वो है जो मैंने उसके बाद लिखी है. मैं आशा करता हूँ की आप लोगों को मेरी रचनाये पसंद आयेंगी. मुझे आपकी प्रतिक्रिया और सुझावों का इंतज़ार रहेगा
No comments:
Post a Comment