Saturday, 30 June 2012

अपने शहर में अजनबी

अपने शहर में अजनबी


एक वक़्त था जब मैं परिचित  था
अपने शहर की हर गली हर मोहल्ले से
अगर कोई मुझसे कोई ऐसा पता पूछता
जिसका मुझे ज्ञान न होता तो मैं
बहुत शर्मिंदा महसूस करता था
क्योकि मैं खुद को इस शहर का बाशिंदा समझता था

एक वक़्त था, जब मैं नुक्कड़ की  छोटी दुकानों में,
सडको और पगडंडियों  पर बड़े गर्व से घूमता  था
अहसास था की  यह शहर मेरा है  और मैं इस शहर का हूँ 
क्योंकि मैं खुद को इस शहर का बाशिंदा समझता  था 

एक वक़्त था, जब मैं भी छोटे से  
घर में परिवार संग रहता था
पर कभी उसका  आकार छोटा नहीं लगा,
हर आने वाले को  इज्ज़त मिली, 
उसके जाने पर  सब दुखी ही हुए 
जो कुछ भी था सबका था, 
मेरा  तेरा या  किसी का कुछ नहीं
क्योंकि मैं खुद को इस शहर का बाशिंदा समझता  था  

एक वक़्त था, जब मैं फक्कड़  दोस्तों के साथ
किसी कुलर वाले रेस्तरां में जाकर
घंटों बेटे रहने के लिए सिर्फ  काफ़ी पीता था 
और बहुत संतुष्ट होता था 
क्योंकि मैं खुद को इस शहर का बाशिंदा समझता  था


आज हजारो रुपये खर्च कर भी वो ख़ुशी नहीं मिलती,
जो मिलती थी चंद रुपये खर्च करके
कितना  बदल गया हूँ वक़्त के साथ साथ,
आइय्ने नें भी पहचानने से मना कर दिया 
अब य़े शहर मेरा नहीं,  न ही मैं इसका 
अब बहुत कुछ बदल चुका है,
अब घरो में बिन बुलाये   मेहमान नहीं  आते,
हमारे दिल बहुत सिकुड़  गए है, हम डरे हुए है,
हम  भूल गए है, मिल बाँट कर खाने की प्रथा
हमारे बच्चों को कैसे  पता चलेगा
वो आपसी प्यार जो उन्होंने देखा ही नहीं 

अब बेशुमार इमारते बन गयी है, और भी  बन रही है
शाप्पिंग माल्स बन गए है, और बहुत बन रहे है
चमकती हुई दुकाने है, लाखों गाड़ियाँ है
हजारो नयी कालोनियां बस गयी है
हर तरफ विस्तार ही विस्तार है
लोग ही लोग है,  परेशानियाँ ही परेशानियाँ है
कोई दुःख दर्द नहीं बांटता
बस हेल्लो,हाय कर  कन्नी काट लेते है लोग,
यह सब  लोग कौन है  कहाँ से  आकर बस गए है
जिन्होंने छीन लिया है  मुझसे मेरा अपना शहर


मैं बहुत बोना  हो  गया हूँ 
शहर की  गगनचुम्बी इमारतों के सामने
अपने ही शहर में मैं अजनबी हो गया  हूँ
कुछ गुमसुम, बेजान  हो  गया हूँ
अब मेरा दिल नहीं लगता यहाँ
और किसी छोटे शहर की तलाश
जारी है, पर अफ़सोस अब छोटे शहर
भी बड़े हो रहे है बड़ी  तेजी   से


विनोद पासी "हंसकमल"

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