Saturday, 30 June 2012

मेरे देश की भाषा


मेरे देश की भाषा
कब अंग्रेजी  हो गयी
पता ही नहीं चला किसी को 
 न कोई राजप्रत   छपा
 न ही हुआ कोई  विरोध प्रदर्शन  
हर नगर, महानगर और कस्बो में
अंग्रेजी ही  बन चुकी है राष्ट्र भाषा
हिंदी तो बन के रह गयी बस
सरकारी अनुवाद की  भाषा

आज हिंदी पत्र पत्रिकाए भी
अंग्रेजी में ही हिंदी छापने को हैं  मजबूर
शायद अकाल पड़ गया होगा हिंदी शब्दों का
या यूं कहे की  हो गयी है  उनको
जानने वालो की संख्या न्यूनतम.


अंग्रेजी के शब्दों की  है इतनी भरमार
की लगता है यही हमारी राष्ट्र भाषा है
हिंदी में तो हम उसे लिख पाठको को
बतलाते है की हम क्या कहना चाहते है
क्योंकि हमारे शब्द कोष में शायद
 उतने  शब्द ही नहीं रहे   उनका मतलब समझाने को 

बोलचाल की भाषा में तो छलनी से छाटने
पड़ते है कुछ हिंदी शब्द, और हम नाज़
करते है की हम अंग्रेजो से भी अच्छी
इंग्लिश लिख और पड़ सकते है

विदेशी सीखते है हमारी भाषा
वो बोलते है हमसे हमारी भाषा
और हम उनसे वार्तालाप  भी नहीं कर पाते
शुद्ध हिंदी में, वो भोच्च्के से रह जाते है
यह जान कर की जिस भाषा को सीखने में
उन्होंने वर्षो लगाये,  उसका गला ही घोट दिया
हमने  अपने देश में.

कभी फुर्सत में बैठकर सोचना
सोच सको जो तुम कभी
क्या कभी कोई देश विदेशी भाषा
की बैसाखियों पर चढ़ पहुंचा
है उन्नति के शिखर पर?

विनोद पासी "हंसकमल"



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