मैं एक अनचाहा मेहमान, घुसा तुम्हारी ज़िन्दगी में
कमरे के एक कोने में, कपडा डाल रख दिया गया
पर मुझमे कुछ आकर्षण था, की घडी की नोक पर
सारा परिवार साथ बैठ मुझे निहारता था और मेरे द्वारा
अपना मनोरंजन समझता था
मेरी पेठ गहरी थी और मैं बैठक से धीरे
धीरे तुम्हारे शयन कक्ष पहुँच गया
जब तक तुम कुछ समझ पाते मैं पूंजीवादियों
के हाथों उनकी कठपुतली बन चुका था
अब तुम सब मेरे २४ घंटों के प्रोग्रामो में
इतना ज़कड़ चुके हो, की चाह कर भी इस
चंगुल से निकल नहीं सकते. मैंने तुम्हे
नशे के घूँट पिला दिए है, और तुम हर
बात जानने के लिए मुझ पर ही निर्भर हो
मैं ही खेल , मैं ही खबरे, मैं ही मनोरंजन,
मैं ही फैशन, मैं ही सिनेमा, मैं ही संगीत, मैं ही समाज,
मैं ही व्यभिचार, मैं ही संस्कार, मैं ही बन गया हूँ सबकुछ
सोच समझ, पढाई लिखाई से दूर कर, जोड़ लिया
मुझसे नाता, और सर्जनात्मकता का कर दिया अंत
मैं ही मीडिया ट्रायल करता, मैं ही जज, मैं ही प्रार्थी
मैं डिबेट के नाम पर बहस कराऊ भोंडे इल्जाम लगवाऊँ
मैं ही चरित्र हनन करूँ और मैं ही लगाऊ मलहम
कोई मुझ पर ऊँगली न उठाए, चाहे मैं हूँ कितना भ्रष्ट
मैं ही मीडिया ट्रायल करता, मैं ही जज, मैं ही प्रार्थी
मैं डिबेट के नाम पर बहस कराऊ भोंडे इल्जाम लगवाऊँ
मैं ही चरित्र हनन करूँ और मैं ही लगाऊ मलहम
कोई मुझ पर ऊँगली न उठाए, चाहे मैं हूँ कितना भ्रष्ट
तुम अब एक दूसरे के बिना तो जी सकते हो
पर मेरे बिना नहीं, मैंने है कई घर उजाड़े,
कई दम्पतियों के संबंधों में दूरियां बना दी
मुझमे है अब इतना आकर्षण क़ि मिट न
पाए चाहे आपसी दूरिया, मेरी हस्ती है की मिटती नहीं
विनोद पासी "हंसकमल"
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