सामाजिक न्याय (आरक्षण पर)
सामाजिक न्याय -
क्या है यह, सामाजिक न्याय -
चंद जातियों के कुछ
चौधुरी-नुमा छोकरों को
आरक्षण की बैसाखी पर
दिन-ब-दिन सिकुड़ती
सरकारी नौकरियों पर
कब्ज़ा करवा देना
इस उम्मीद पर क़ि
उनकी अनपढ़ जातियों के बेशुमार
लोग सुनहले सपनो के नशे में
अपना कीमती मत दल देंगे
तुम्हारे "दलों " को
वोटों की राजनीति में लोग,
समुदाह, जातियां, उपजातियां,
एक संख्यात्मक हथियार के
ज्यादा कुछ नहीं
जिस देश की 80 % जनता
अनपढ़ और गरीब हो,
पीने के पानी और
तन ढकने के लिए
कीड़े मकोड़ों की तरह
झुग्गियों में रहने को मोहताज हो
ऐसे में हर व्यक्ति को समान वोट का अधिकार
लोकतंत्र में हमारी आस्था नहीं
ब्लकि लोकतंत्र की आढ़ में गहरी
सोची समझी राजकीय साजिश है
इस लोकतंत्र और जनमत पर विश्व नेता
चाहे कितने ही कसीदे क्यों न पढ़े
कितने ही भाषण उनकी दूरदर्शिता को सराहें
पर, इस बार बार ठगी जनता के लिए
इस कागज़ के टुकड़े की कीमत
रोटी, कपडा, मकान, सड़क, बिजली
चिकित्सा और शिक्षा के सपनो से बढकर कुछ नहीं
बार बार ठगी इस जनता को
जहाँ अफसरशाही, नगर-पालिका और
न्यालयों से भी दुत्कार मिलती हो
वहां सामाजिक न्याय की बातें करना
पूर्णता बेईमानी नहीं तो और क्या है?
हक मिलता है, संघर्ष से,
शिक्षा, मेहनत और लगन से
न की इन भ्रष्ट नेतायों की बातों से
जो कभी नहीं चाहते की देश की जनता
जागे कभी अपनी कुम्भ्करनी नींद से
यह तो उसे समय समय पर
इन्द्र-धनुषी सपने दिखा छीन लेते है
वो कागज़ का टुकड़ा
जिसके बलबूते, अपने गले में
अपनी तख्ती के कीमत लगा बिकते है
सत्ता के गलियारों में
बदले में दे देते है निरीह जनता को
सरकारी सम्पति नष्ट करने का,
पथराव और आगजनी का अधिकार
पुलिस के लाठियां और गोलियां खाने,
अक्शु-गैस सहने का, आत्मा दह करने का
जेल जाने का प्रसाद.
उन्हें तो अपना सामाजिक न्याय करना है
तुम्हारे कागज़ के टुकड़े से,
तुम क्यों उम्मीद ज़दा हो की वो
कभी कुछ करेंगे तुम्हारे लिए
विनोद पासी "हंसकमल"
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