Monday, 2 July 2012

कब्रिस्तान   की शांति



आग लगी देखो आग लगी
स्वार्थ -सिद्धि  की  आंधी में
लालच की है आग लगी

बलिदान तुल रहे पैसो में
प्यार तुल रहे पैसो  में
जिस्म बिक रहे पैसो में
ईमान बिक रहे पैसो में

यह हवा कहाँ से है चली
कहाँ हमें ले  जा रही
संग अपने मानव के
मानवता को उडा रही

विश्व शांति की आड़ में
परमाणु परिक्षण चल रहे
गोलियों की बोछारों में
बेगुनाह मौत के घात उतर रहे

दरिद्र दया का अधिकारी
भूख-प्यास, बीमारी में बिलख रहा
और उधर मानव अधिकारों की
सुरक्षा का अभियान भी चल रहा

मिट जायेंगे   जब अधिकांश मानव
विश्व शांति स्वयं ही आ जाएगी
पर क्या होगा ऐसे शांति से
जो कब्रिस्तान की शांति होगी


विनोद पासी "हंसकमल'

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