Monday, 23 July 2012

रंग बदलता इंसान





पड़ लिख कर सब लोग
एक सा  ही व्यव्हार करते है
अफसर बनकर सब लोग
एक सा ही व्यव्हार करते है
बड़ा आदमी बन कर सब लोग
एक सा ही व्यव्हार करते है
एक  मुकाम पा लेने पर सब
अपनों से अपने को काट लेते है
वह अपने जैसो की मदद तो करता है
पर अपनों से नीचे रह गयो की नहीं  

अपने से छोटे को ह्या दृष्टि से देख
उससे कन्नी काटता  है, उससे दूरी
बना कर रखना चाहता है
और ये भी चाहता है की
वो लोग अपना नजरिया बदले

विपक्षी  राजनेतिक पार्टिया दिन रात जिस
सताधारी दल की नीतियों को कोसती है
सता-रूड होते ही कुछ लीपा पोती कर
उन्ही नीतियों पर चल पड़ती है
जनता ठगी  की ठगी  रह जाती है

समाजवादी  नेता सता पाते ही
खुद पूंजीवादी बन जाते है
मजदूर नेता, कभी कटपुतली बन
तो कभी  सोच समझ कर
मालिको के हितो की रक्षा करते है
और अपने ही साथियों पर ढाते  है  ज़ुल्म

कितना खोखला  है इंसान
नौकर बनकर मालिक की
जिन कमियों के कोसता है
मालिक बनकर बिलकुल
वैसा  ही बर्ताव करता  है
यह केवल इंसानी फितरत है
जो हर समय रंग बदलती है

क्या कभी किसी और को देखा है
यूं रंग बदलते हुए ?

सच्चाई तो ये है की हम दूसरो की
शक्ति हथियाने को लालायित रहते है
क्योंकि अन्दर से हम सब जानते है की
इस भ्रष्ट तंत्र का कोई अंत नहीं है
हमारी भूख क्या है और कितनी खोखली है
हमारी अपनी सोच,


बिना नई  सोच
बिना नई विचारधारा केकभी कोई
विकल्प न पैदा हुआ  है, न होगा
बदलना तो  खुद अपने आप को होगा

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