Monday, 2 July 2012

अंतिम विदाई



कितना
शांत सोया है मेरा हमसफ़र आज 
वर्षो की लंबी थकान के बाद 
आज कोई ख्वाब है कोई 
चिंता, न नींद न आने की बेचैनी
न उनिद्दी उठने की चिंता
बस मुख पर है एक शालीनता 
जो चेहरे की झुरियो में भी सॉफ दिखाई 
दे रही है मेरे लोचनों को,जिन्होने देखी है 
वो बेचैन तड़पती रूह जिसे हर पल कोई 
कोई चिंता अपने दामन में घेरे रहती थी 
अब बार बार रातो का उठना होगा  
 
कोई बतियाने को होगा और होगा 
दुनियाँ ज़हां का दुख दर्द जीने वाला
न बिस्तर पर डर के खराटे होगें
न बार बार बाथरूम जाने की होगी चेष्टा खीज उठती थी वो सब बातों से
बतियां जला कर पड़ने का उपक्रम होगा


अब तरसेगे कर्ण उन्ही सब को सुनने 
आज फ़ुर्सत नहीं है इन सब बातों को सोचने की,आज वक़्त है शालीनता से सोए साथी को
चुपचाप निहारने का, उसके इस रूप को समां लेने का






पर लोग आ जा रहे है, कुछ झुण्ड बना छाया में खड़े है
इंतज़ार  कर रहे है विधि सम्बत उनके पार्थिव शरीर को
शमशान घाट ले जाने का, उनकी निर्जीव देह को
उसकी अंतिम यात्रा पर ले जाने को
 

आँसू रह रह कर छलक रहे है बात बेबात पर 
और एक पल भी नहीं मिल रहा उनके दीदार का
सब तरफ बस गम का आलम है और मैं हूँ अपने परायों के बीच
तठस्थ सी गुमसुम, न अपनी होश न खबर अपने आसपास की


विनोद पासी "हंसकमल"

 
 

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